Book Title: Aavashyak Sutram Purv Bhag
Author(s): Bhadrabahuswami, Jindasgani Mahattar,
Publisher: Rushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha
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श्री आवश्यक
चूर्णों ज्ञानानि
॥१५॥
समसेडीए सुणेइ तं मीसग सुणोतति' बत्थ पुण ताणि भासादब्वाणि कवरेण जोगेण मेण्हति ? कतरेण वा णिसरतित्ति ?, है भाषादव्यआयरिओ शाह- .
ग्रहणादि गेण्हइ य काइएण०॥७॥ भासालद्धीओ जीवो भासागहणपाउग्माणि दव्वाणि कायजोगण घेत्तूण भासताए परिणामेउं वयजोगेण पिसिरति, णिसिरह णाम भासइचि बुत्तं भवति, सो पुण ताणि दव्वाणि एगंतरेण मेण्हति एक्कन्तरं च णिस्सिरचिति, | कई?, एगसमएण जया भासापोग्गलागहिया भवति तदा एगेण चेव समएण णिसिरति, एवं महणामिस्सिरणं काउं कोइ तंमि चेवहितो
भवति, ठितिक्खयं वा करेज्जा, एवं गहणानिसिरणाणं कालो जहण्णेण दुसमइओ उक्कोसेणं अंतोमहचितो, ते पुण अंतोमहत्तस्स समयाद | असंखेज्जा णायब्वा, तेसु एक्कंतरं गेहति णिसिरति य, कहं , जो भासंतो-जो उवरमति सो जमि समए णिस्सरति तंमि चेव समए भासं भासतो अण्णाणि भासादब्वाणि पुणो गेण्हति, घेत्तूण य तइए समए णिसिरति, ताणि य वितियसमयमाहताणि तइए समए णिसिरमाणो अण्णाणि भासादब्वाणि पुणो गेण्हति, ताणि चउत्थे णिसरति, ताणि य तइयसमयगहियकाणि चउत्थे | समए णिसिरमाणो अण्णाणि भासादव्वाणि पुणो गेण्हति, ताणि पंचमे समए णिसरति, एवं एसांतरं तस्स पुगंतरं शिरिसरं| तस्स य अब्भतरेसु मुहुत्तस्स असंखेज्जा समया भवंति ॥७॥ जाणि पुण ताणि भासाव्यापण गेण्हह काइएण जोगेण ताण पंचण्ड * सरीराणं कतरेणं हतित्ति', एत्थ भण्णातिति
॥१५॥ तिविहंमि सरीरंमि०टातिविहसरीरमहणेण ओरालियवेउब्वियआहारगाणं गहणं कयं, इयसाणि पुण तेयाकम्ममाण तदंबग्म-3 लायाणि चेव काऊण ण भणियाणि, जस्स ओरालियसरीरं मो जीवपएसेहिं गेण्हिऊण ओरालियसरीरेण णिसिरति, जस्स देउक्क्यिसरीरं
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