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________________ श्री कल्पमुक्तावल्यां सप्तविंशति भव वृत्तांतः कर्णयोः कर्मणा तेन वीरस्य ज्ञानवारिधेः॥ जातो वीर भवे इन्त ? कीलक्षेपोऽति दुःसहः॥ 87 // कृतानेकमहाघोर, कर्माऽसौ निधनङ्गतः // चतुरशीति लक्षाब्दमायुः स्वस्य समाप्य नु // 88 // भवे त्वेकोनविंशेऽथ सप्तमे निरये त्वसौ // उत्पन्नो नारकत्वेन कर्मणागति रीदृशी // 89 // निर्गत्येतो भवे विंशे भूत्वा सिंहो मृत स्त्वरा // एकविंशे भवे जज्ञे चतुर्थनरके सकः॥९॥ निर्गत्येतश्विरम्भ्रान्त्वा भवे द्वाविंशसंज्ञके // मनुजत्वञ्च सम्प्राप्य शुभकर्माणि चाचरत् // 91 // त्रयोविंशे भवे तस्मान्मकापुर्यां सुकर्मणा // धनञ्जयधरानाथधारिणीवरकुक्षितः // 92 // तुर्याष्ट लक्ष पूर्वायु नाम्ना च प्रियमित्रक // प्रियकीकृत विश्वाङ्गी चक्रवर्ती व्यजायत // 13 // पोट्टिलाचार्य पार्वेऽसौ दीक्षामादाय पुण्यधीः // परिपाल्याब्दकोटिं ताङ्गतासु रभवत्ततः॥९॥ चतुर्विशे भवे कल्पे सप्तमेऽजनि निर्जरः॥ पञ्चविंशे ततश्च्युत्वा भवे मोद प्रदायके // 95 // इहैव भरतक्षेत्रे छत्रिकायां महापुरि // जितशत्रु नपो जातो भद्रा तस्य च गेहिनी // 96 // तत्कुक्षौ नन्दनो नाम जज्ञे पुत्रोऽति वल्लभः॥ पञ्चविंशति लक्षाब्द, पूर्वायु विश्वनन्दनः // 97 // पोटिलाचार्य पार्श्वेऽथ व्रतमादाय सुन्दरम् // मासक्षपणकै विज्जीवं लक्षाब्दकालके // 99 // चरित्रम्पालयामास विशुद्ध शुद्धभावनः // तपसो विंशतिस्थाननाम्नश्चाराधनेन तु // 99 // तीर्थङ्कगभिधानीय निकाच्य नामकर्मकम् // महत्वं केन वर्येत तपसोऽत्र विपश्चिता // 10 // विधाय मासिकी दिव्यां कर्म विध्वंसकारिणीम् / / संलेखनां विधानेन मृतोऽसौ विशदाशयः॥१०१॥ ANSANSAR
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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