________________ गणधरवादः श्रीकल्पमुक्तावल्या // 267 / विज्ञानघनवाक्यानां, पूर्वोक्तार्थपथेन च, भूतेभ्यो भिन्न एवात्मा, चास्ति काऽत्र विचारणा // 67 // छिन्नसन्देहबन्धोऽसौ, वायुभूति स्तदा मुदा, पञ्चशतस्वशिष्यैश्च, दीक्षितोऽभूज्जिनान्तिके // 68 // // इति तृतीयो गणधरः // 3 // दीक्षितानिन्द्रभूत्यादी-नाकर्ण्य व्यक्तपण्डितः, पूज्यत्वात्सोऽपि स शिष्यः, संशयालुरथागमत् // 69 // गत्वा दृष्टवा च तादृक्ष, प्रभुं संशयभेदकम् , मुमुदे भगवानाह, व्यक्तपण्डित ! भो शृणु // 70 // भूतानि सन्ति वा नेति, विषये संशयस्तव, सत्यार्थे वेदवाक्यस्य, विद्यते त्वविचारतः // 71 // ( वेदवाक्यम् ) स्वप्नोपमं वै सकलं इत्येप ब्रह्मविधि रञ्जसा विज्ञेयः // // अस्यार्थ:-पृथिव्यादिकमेतद्धि, नामरूपात्मकञ्जगत , असच सकलं नूनम् , स्वप्नदृष्टपदार्थवत् // 72 // अनया वेदवाण्या च, भूताभावः प्रतीयते, (पृथ्वी देवता आपोदेवता) इत्यादि वेदवाक्यैश्च, भूतसत्ता प्रतीयते // 73 // सन्देहोऽयं महां स्तेऽस्ति, विचाराभावतः परम् , नश्यति च विचारेण, पविनेव गिरिव्रजः // 74 // स्वप्मोपममिदं सर्व, मित्यादिवेदवाक्यता, अध्यात्मचिन्तने तेषा-मनित्यं सूचयत्यलम् // 75 // कलत्रापत्यसंयोगः, स्वर्णादीनान्तथैव च, अनित्यः खलु विज्ञेय, श्थानित्यसूचिका त्वतः // 76 // पृथ्व्यादिपञ्चभूतानि, निषेधयति नो कदा, सत्यार्थमिदमेवास्ति, वेदवाक्यस्य धार्यताम् // 77 // छिन्नसंशयशल्योऽसौ, शिष्यैः पञ्चशतैः स्वकैः, दीक्षितोऽभूज्जिनाभ्यणे, व्यक्तपण्डितराडपि // 78 // M / 267 //