SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 393
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आवश्यक निर्युक्तेरव चूर्णिः सम्यक्त्वादेर्निरुक्त्वयःनिगा 860-864 // 385 // सम्यक्त्वचरणसहिता उत्कृष्टतः सर्वलोकं स्पृशन्ति केवलिसमुद्घातावस्थायां, जघन्यतस्त्वऽसख्येयभागं,श्रुतसहिताः सप्त चतुर्दशभागाननुत्तरसुरेष्विलिकागत्या समुत्पद्यमानाः, चशब्दात्पश्च तमःप्रभायां, देशविरत्या सहिताः पञ्च अच्युते उत्पद्यमानाः, चशब्दात व्यादींश्चान्यत्र, अधस्तु ते न गच्छन्त्येव परिणाममपरित्यज्य // 859 // क्षेत्रस्पर्शना उक्ता, भावस्पर्शनोच्यतेसब्वजीवहिं सुयं सम्मचरित्ताई सबसिद्धेहिं / भागेहिं असंखेजेहिं फासिया देसविरईओ॥ 860 // सर्वजीवैः सांव्यवहारिकराश्यन्तर्गतैः सामान्यश्रुतं, असङ्ख्येयभागेन तु न स्पृष्टा यथा मरुदेव्या // 860 // निर्वचनंक्रियाकारकभेदपर्यायैः शब्दार्थकथनं निरुक्तिः, तत्र सम्यक्त्वस्य तामाहसम्मदिद्धि अमोहो सोही सन्भाव सणं बोही / अविवजओ सुदिहिति एवमाई निरुत्ताई // 861 // सम्यग्दृष्टिः, अर्थानामिति गम्यते, अमोहो अवितथग्रहः, शुद्धिः मिथ्यात्वापगमात् // 861 // श्रुतस्याहअक्खर सन्नी संमं सादियं खलु सपजवसियं च / गमियं अंगपविठं सत्तवि एए सपडिवक्खा // 862 // देशविरतेराहविरयांविरई सुंवुडर्मसंवुडे बालपंडिए चेव / देसेक्कदेसविरई अणुधम्मो अगारधम्मो य // 863 // अणुधर्मो बृहत्साधुधर्मापेक्षया देशविरतिः॥ 863 // सर्वविरतेराहसामाइयं समंइयं सम्मावाओ समास संखेवो / अणर्वजं च परिणा पच्चखाणे य ते अह॥ 864 // समस्य अयः-गमनं समायः स एव सामायिकं, एकान्तोपशान्तिगमनं, सम्यगयः समयः-सम्यग्दयापूर्वकं जीवेषु गमनं, // 385 // आ०चू०३३]
SR No.600447
Book TitleAvashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManvijay
PublisherDevchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund
Publication Year1965
Total Pages460
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy