________________ वसुधारा बावश्यक नियुक्तेरव चूर्णिः // 227 // गत्यादि धर्मचक्रं च नि० गा. 332337 RECERTERRORK उत्कर्षतश्च परिमाणमाह.. अद्धतेरसकोडी, उक्कोसा तत्थ होइ वसुहारा / अद्धतेरस लक्खा, जहणिआ होइ वसुहारा // 332 // सार्द्धद्वादशहिरण्यानां कोटय उत्कृष्टा, सार्द्धानि द्वादश हिरण्यानां लक्षाणि जघन्या // 332 // अथ यैः प्रथमभिक्षा दत्ता ते किम्भूता अभवन्नित्याहसबेसिपि जिणाणं, जेहिं दिण्णाउ पढमभिक्खाओ। ते पयणुपिजदोसा, दिववरपरकमा जाआ॥३३३॥ केई तेणेव भवेव, निव्वुआ सबकम्मउम्मुक्का / अन्ने तइअभवेणं, सिन्झिस्संति जिणसगासे // 334 // सुगमे // 333 // 334 // अथ पूर्वोक्तं निर्वाहयतिकल्लं सविड्डीए, पूएमहऽदङ धम्मचकं तु / विहरइ सहस्समेगं, छउमत्थो भारहे वासे // 335 // बहलीअडंबइल्लाजोणगविसओ सुवण्णभूमी अ। आहिंडिआ भगवआ, उसमेणं तवं चरंतेणं // 336 // - बहली अ जोणगा, पण्हगा य जे भगवया समणुसिट्ठा / अन्ने य मिच्छजाई, ते तइआ भद्दया जाया // 337 // कल्ये-प्रगे सर्वा पूजयाम्यहं, प्रातर्गतोऽदृष्ट्वा भगवन्तं तत्पदभूमौ धर्मचक्राख्यं चक्र कारितवान् , तच्च सर्वरत्नमयपञ्चयोजनोच्छ्रितदण्डस्योपरि सर्वरत्नमयं सहस्रारं योजनायामविष्कम्भं वृत्ताकारं, चूण्ाँ तु चक्रस्यैतदेव मानं दण्डस्तु योजनोच्छ्रय एवोक्तः, लघु वृत्तोच्छ्रितं योजनशतं विष्कम्भोऽष्ट योजनानां // 335-337 // तित्थयराणं पढमो, उसभसिरी विहरिओ निरुवसग्गो / अट्ठावओ णगवरो, अग्गभूमी जिणवरस्स // 338 // // 227 //