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________________ श्रीभगवत्यई श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1573 // 30 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 824 क्रियावाद्यादीनिसमव सरणानि अकिरियवादी किं नेरइयाउयं पुच्छा, गोयमा! नो नेरइयाउयंप० मणुस्साउयंपिप० तिजोणियाउयंपिप० देवाउयंपि पकरेइ, एवं अन्नाणियवादीविवेणइयवादीवि, जहा तेउलेस्सा एवं पम्हलेस्साविसुक्कलेस्साविनेयव्वा // 17 अल्लेस्साणंभंते! जीवा किरियावादी किं णेरइयाउयं पुच्छा, गोयमा! नो नेरइयाउयं प०, नो तिरिक्ख० नो मणु० नो देवाउयं प० / 18 कण्हपक्खिया णं भंते! जीवा अकिरियावादी किं नेरइयाउयं पुच्छा, गोयमा! नेरइयाउयंपि प० एवं चउविहंपि, एवं अन्ना०वि, वेण०वि सुक्कप० जहा सलेस्सा, १९सम्मदिट्ठीणं भंते! जीवा किरियावादी किंनेरइयाउयं पुच्छा, गोयमा! नोनेरइयाउयंप० नोतिरिक्ख० मणुस्साउयंप० देवाउयंपि प०, मिच्छादिट्ठी जहा कण्हपक्खिया, 20 सम्मामिच्छादिट्ठीणं भंते! जीवा अन्नाणियवादी किं नेरइयाउयं जहा अलेस्सा, एवं वेणइयवादीवि, णाणी आभिणिबोहियनाणी य सुयनाणी य ओहिनाणी यजहा सम्मदिट्ठी, 21 मणपज्जवणाणी णं भंते! पुच्छा, गोयमा! नो नेरइयाउयं प० नो तिरिक्ख नो मणुस्स० देवाउयं प०, 22 जइ देवाउयं प० किं भवणवासि० पुच्छा, गोयमा! नो भवणवासिदेवाउयं प० नो वाणमंतर० नो जोइसिय० वेमाणियदेवाउयं, केवलनाणी जहा अलेस्सा, अन्नाणी जाव विभंगनाणी जहा कण्हपक्खिया, सन्नासु चउसुवि जहा सलेस्सा, नोसन्नोवउत्ता जहा मणपज्जव सवेदगा जाव नपुंसगवेदगा जहा सलेस्सा, अवेदगा जहा अलेस्सा, सकसायी जाव लोभकसायी जहासलेस्सा, अकसायी जहा अलेस्सा, सयोगी जाव काययोगीजहासलेस्सा, अजोगी जहा अलेस्सा, सागारोवउत्ताय अणागारोवउत्ता जहा सलेस्सा / / सूत्रम् 824 // कइ ण मित्यादि, समोसरण त्ति समवसरन्ति नानापरिणामा जीवाः कथञ्चित्तुल्यतया येषु मतेषु तानि समवसरणानि, समवसृतयो वाऽन्योन्यभिन्नेषु क्रियावादादिमतेषु कथञ्चित्तुल्यत्वेन क्वचित्केषाश्चिद्वादिनामवताराः समवसरणानि, किरियावाइ त्ति क्रिया कर्तारं विनान संभवति साचात्मसमवायिनीति वदन्ति तच्छीलाश्च येते क्रियावादिनः, अन्ये त्वाहुः क्रियावादिनो // 1573 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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