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________________ श्रीसमवायाङ्गं श्रीअभय० वृत्तियुतम् // 23 // समवायः मदस्थानादिः प्राग्वत्, नवरं केवलिसमुद्धातो वेदनीयनामगोत्राश्रय इति, तथा रत्निः- वितताङ्गलिहस्त इति, ऊोच्चत्वेन न तिर्यगुच्चत्वेनेति, होत्था बभूवेति, तथा अभिजिदादीनि सप्त नक्षत्रााणि पूर्वद्वारिकाणि, पूर्वदिशि येषु गच्छतःशुभं भवति, एवमश्विन्यादीनि दक्षिणद्वारिकाणि पुष्यादीन्यपरद्वारिकाणि स्वात्यादीन्युत्तरद्वारिकिाणीति सिद्धान्तमतमिह तु मतान्तरमाश्रित्य कृत्तिकादीनि सप्त सप्त पूर्वद्वारिकादीनि भणितानि, चन्द्रप्रज्ञप्तौ तु बहुतराणि मतानि दर्शितानीहार्थ इति, स्थितिसूत्रे समादीन्यष्टौ विमाननामानीति // 7 // ___ अट्ठ मयट्ठाणा प० तं०- जातिमए कुलमए बलमए रूवमए तवमए सुयमए लाभमए इस्सरियमए, अट्ठ पवयणमायाओ प० तं०-ईरियासमिई भासासमिई एसणासमिई आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिट्ठावणियासमिई मणगुत्ती वयगुत्ती कायगुत्ती, वाणमंतराणं देवाणं चेइयरुक्खा अट्ट जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं प०, जंबू णं सुदंसणा अट्ठ जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं प०, कूडसामली णंगरुलावासे अट्ठजोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं प०, जंबुद्दीवस्स णं जगई अट्ठ जोयणाई उद्धं उच्चत्तेणं प०, अट्ठसामइए केवलिसमुग्घाए प० तं०- पढमे समए दंडं करेइ, बीए समए कवाडं करेइ, तइए समए मंथं करेइ, चउत्थे समए मंथंतराई पूरेइ, पंचमे समए मंथंतराइ पडिसाहरइ, छट्टे समए मंथं पडिसाहरइ, सत्तमे समए कवाडं पडिसाहरइ, अट्ठमे समए दंडं पडिसाहरइ ततो पच्छा सरीरत्थे भवइ, पासस्स णं अरहओ पुरिसादाणिअस्स अट्ठ गणा, अट्ठ गणहरा होत्था, तं०- सुभे य सुभघोसे य, वसिट्टे बंभयारिय। सोमे सिरिधरे चेव, वीरभद्दे जसे इय॥१॥अट्ठ नक्खत्ता चंदेणं सद्धिं पमई जोगंजोएंति, तं०- कत्तिया 1 रोहिणी 2 पुणव्वसू ३महा 4 चित्ता 5 विसाहा 6 अणुराहा 7 जेट्ठा 8, इमीसे णं रयणप्पहाए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठ पलिओवमाई ठिई प०, चउत्थीए पुढवीए अत्थेगइयाणं नेरइयाणं अट्ठ सागरोवमाई ठिई प०, असुरकुमाराणं देवाणं अत्थेगइयाणं // 23
SR No.600440
Book TitleSamvayang Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages300
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_samvayang
File Size20 MB
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