________________ श्रीसूत्रकृताङ्गं नियुक्तिश्रीशीला० वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्धः 2 // 640 // श्रुतस्कन्धः 2 तृतीयमध्ययन आहारपरिज्ञा, सूत्रम् 43-55 (678-690) बीजकाय चतुष्टयादिः एवं पुढविजोणिएसुतणेसुतणत्ताए विउटुंति जावमक्खायं // सूत्रम् 52 // ( // 687 // ) एवं तणजोणिएसुतणेसुतणत्ताए विउटुंति, तणजोणियंतणसरीरंच आहारेंति जावमक्खायं // एवं तणजोणिएसुतणेसुमूलत्ताए जाव बीयत्ताए विउटुंति ते जीवा जाव एवमक्खायं ॥एवं ओसहीणवि चत्तारि आलावगा॥ एवं हरियाणवि चत्तारि आलावगा॥ सूत्रम् 53 // ( // 688 // ) अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता पुढविजोणिया पुढविसंभवा जाव कम्मनियाणेणं तत्थवुक्कमा णाणाविहजोणियासुपुढवीसु आयत्ताए वायत्ताए कायत्ताए कूहणत्ताए कंदुकत्ताए उव्वेहणियत्ताए निव्वेहणियत्ताए सछत्ताए छत्तगत्ताए वासाणियत्ताए कूरत्ताए विउद्भृति, ते जीवा तेसिंणाणाविहजोणियाणं पुढवीणं सिणेहमाहारेंति, तेवि जीवा आहारेंति पुढविसरीरंजाव संतं, अवरेऽवियणं तेसिं पुढविजोणियाणं आयत्ताणं जाव कूराणं सरीरा णाणावण्णा जावमक्खायं, एगो चेव आलावगो सेसा तिण्णि णत्थि। अहावरंपुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणिया उदगसंभवा जाव कम्मनियाणेणं तत्थवुकमाणाणाविहजोणिएसु उदएसुरुक्खत्ताए विउटुंति, ते जीवा तेसिंणाणाविहजोणियाणं उदगाणं सिणेहमाहारेंति, ते जीवा आहारेंति पुढविसरीरं जाव संतं, अवरेऽवि यणं तेसिं उदगजोणियाणं रुक्खाणं सरीराणाणावण्णा जावमक्खायं / जहा पुढविजोणियाणं रुक्खाणं चत्तारिगमा अज्झारुहाणवि तहेव, तणाणं ओसहीणं हरियाणं चत्तारि आलावगा भाणियव्वा एक्कक्के ।अहावरं पुरक्खायं इहेगतिया सत्ता उदगजोणिया उदगसंभवा जाव कम्मणियाणेणं तत्थवुकम्मा णाणाविहजोणिएसु उदएसु उदगत्ताए अवगत्ताए पणगत्ताए सेवालत्ताए कलंवुगत्ताए हडताए कसेरुगत्ताए कच्छभाणियत्ताए उप्पलत्ताए पउमत्ताए कुमुयत्ताए नलिणत्ताए सुभगत्ताए सोगंधियत्ताए पोंडरियमहापोंडरियत्ताए सयपत्तत्ताए सहस्सपत्तत्ताए एवं कल्हारकोंकणयत्ताए अरविंदत्ताए तामरसत्ताए भिसभिसमुणालपुक्खलत्ताए पुक्खलच्छि // 640 //