________________ सिरिसिरि // 157 // बालकदा पुच्छइ तओ कुमारो कहह समस्सापयाई निययाई। तो कुमरिसंनिया पंडियावि पढमं पयं पढइ // 860 // 'मणुवंछिय फल होइ' एसा सहीमुहेणं जं कहइ समस्सापयं मएणावि / पूरेयव्वं केणवि पुत्तलयमुहेण हेलाए // 861 // इय चितिऊण पासढियस्स थंभस्स पुत्तलयसीसे / कुमरेण करो दिनो ता पुत्तलओ भणइ एवं // 862 // ततः कुमारः पृच्छति, यूयं निजकानि-स्वकीयानि समस्यापदानि कथयत, ततः-तदनन्तरं कुमा- 151 संज्ञिता पण्डिता सखी अपि प्रथम-एकं समस्यापदं पठति-कथयति // 86 // किं तदित्याह-'मणु' इत्यादि है। प्रथमं समस्यापदमिदम् . एतत् समस्यापदं सखीमुखात् श्रुत्वा कुमारश्चिन्तयति-एषा राजकन्या यत्सखीमुखेन पदं कथयति तन्मयापि केनापि पुत्रकमुखेन हेलया-लीलया समस्यापदं पूरयितव्यम् // 861 // इति चिन्तयित्वा कुमारेण 860 स्पष्टम् / ८६१-स्पष्टम् / ८६२-अत्र पुत्रकशीर्षेकर स्थापनतस्तद्भजनमतीव विस्मयोत्पादक सभ्यानामिति / // 157