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________________ वालकदा सिरिसिरि // 143 // कुमरो वामणरूवो रायकुमारेहिं सह गओ तत्थ। जत्यत्यि उवज्झाओ वीणासत्थाइं पाढतो // 778 // जह जह उयझायं पड़ वामणओ कहह मंऽपि पाढेह / तह तह रायकुमारा हसंति सव्वे हडहडत्ति // 779 // दटुं अपाढयंत उवझायं झत्ति तस्स धामणओ। अप्पेइ हत्थखग्गं हेलाए अइमहग्घंपि // 780 // द इति सशृङ्गारास्तान् राजकुमारान् पश्यति // 777 / / कुमारो वामनरूपः सन् अन्य राजकुमारः तत्र गतः यत्र | वीणाशास्त्राणि पाठयन् उपाध्यायोऽस्ति / / 778 / / अथ वामनको यथा यथा उपाध्यायं प्रति कथयति, किमित्याह-मामपि पाठयतेति, तथा तथा सर्वे राजकुमारा हडहड इति हसन्ति // 779 / / तदा वामनक उपाध्यायं अपाठयन्तं दृष्ट्वाऽतिमहामपि-बहुमूल्यमपि हस्तखङ्गं-स्वहस्तकरवालं हेलया| लीलामात्रेण झटिति-शीघ्रं तस्मै उपाध्याय अर्पयति-ददाति // 780 // ततः-तदनन्तरं उपाध्यायस्तं वाम ५७८-अत्र वामनस्यापि कन्यारत्नप्राप्तिनिमित्समध्यापनप्रार्थनाहासबीजमनुसन्धेयम् / ७८०-अश्रोपाध्यायासिमहाघखदान प्रलोभनार्थमिति व्यख्यते / KOREAKTx // 143 / /
SR No.600404
Book TitleSirisiriwal Kaha Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatnashekharsuri, Bhanuchandravijay
PublisherYashendu Prakashan
Publication Year1963
Total Pages250
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size13 MB
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