________________ 1183 // सर्वगिलस्य वृत्तान्तान् कोवित्तान् नो जुगुप्सते ? // 49 // आदीक्षादिवसात्तस्य कमलस्य महात्मनः / व्रतार्थमुच्चां मच्चेतश्चकार सुतरां त्वराम् // 50 // मुहूर्तमपि नेच्छामि गृहवासमतः परम् / प्राच्योऽपि व्रतशून्यो मां दुनोत्युच्चैदिनव्ययः // 51 // जराभिमुखमायाति श्रीदेवन मृत्युर्धावति पृष्ठतः / रुजः पाव न मुश्चन्ति तद्धर्म का प्रमत्तता // 52 // इति प्रादुःकृताकूते देवनन्दिनि भूपतिः। आह्वाय्य | न्दिना | सुमतिं चक्रे कोशागाराधिकारिणम् // 53 // श्रीशीलगुणसूरीणां पादपद्मान्तिके व्रतम् / आदाय देवनन्दी तु क्रमेण सुगतिं ययौ श्रीशील॥५४॥ शंसित्वेमां कथामेवं विश्रान्ते शुकपुंगवे / भूयोऽपि पिच्छमुद्धृत्य क्षारं रत्नवती ददौ / / 55 / / अवादि च क पाण्डित्यं गतं ao गुणसूरि| रे कीर ! तत्तव / प्राणत्राणकृते कोऽपि यदुपायो न मृग्यते // 56 // सुलोचनायाः पाण्डित्यं तस्याः साध्वीशिरोमणेः। निहितास्ते | पार्श्वे दीक्षा | यया गर्ने त्रयः कामावरादयः॥५७।। इत्युक्ते तेन साऽपृच्छदरे केयं सुलोचना / सोऽवोचदऽयमाख्यातुं सजोऽस्म्यऽवहिता शृणु | स्वीकृता // 58|| कार्यों ममात्र्तिमुत्पाद्य कथाच्छेदस्तु न त्वया / सुस्थैरपि कथाः कष्टं कथ्यन्ते किमुदितादितैः 1 // 59 / / भवामि तन्मयं सर्व विस्मरामि कथासु ते / मा भैषीब्रूहि विश्रब्धमिति प्रोक्तस्तया शुकः॥६०॥ दुरितानां तिरोधाने जवनी कालयापना। इति | ध्यात्वा कथामेनां वक्तुमेवं प्रचक्रमे // 61 / / युग्मम् / तद्यथा अवन्तिष्वस्ति विस्तीर्णा द्यौरिवोजयिनी पुरी / श्रीमानुसयामास तां राजा नरवाहनः // 62 // तस्याऽसीत् सेवको राज-पुत्रः। | पालकसंज्ञितः। सतीजनशिरोरत्नं प्रिया चास्य सुलोचना // 63 / / उपदेशात् प्रवत्तिन्याः सुधियो मलयश्रियः / प्रपेदे विमलाचार्यसमीपेऽणुव्रतानि सा // 64|| असौ सातिशयं दधे नित्यमत्यप्सरा अपि / शीलं रूपगुणे स्वर्ण सौरभ्यमिव दुर्लभम् // 65 // अथाऽन्ये // 8 // द्युस्तया राजकुलादभ्यागतः पतिः। उद्विग्नहृदयो बाढं दृष्टः पृष्टश्च कारणम् // 66 // स आख्यदऽस्ति प्रत्यन्तभूभृदुःशासनाढयः /