________________ श्रीअमम जिनचरित्रम् सत्वोपरि // 56 // दृढमित्र कथानकं कीरोक्तम् | दोहदः / करिदन्तमयप्रांशुप्रासादे क्रीडितुं चिरम् // 9 // तस्माच्च कृष्णपक्षेन्दुकलेव कृशतांश्रिता / कालादुपांशु निबन्धात् पृष्टा राज्ञा शशंस सा // 10|| कालक्षेपमिदं कार्य क्षमते नेति चिन्तयन् / इदं सद्यः पुरे राजा पटहेनोदधोषयत् // 11 // मूल्येन वणिजो दन्तिदन्तानानीय दत्त मे / दण्डस्तस्य पुनः प्राणाख्यास्यति सतोऽपि यः // 12 // प्रासादोऽथ वणिग्लोकदत्तरात्तैश्च मूल्यतः / दन्तै| रारभ्यत हठाच्छिन्नैः शशिकरैरिव // 13 // इतश्च धनमित्राख्यस्तत्रासीदीश्वरो वणिक् / वयस्यो दृढमित्रोऽस्य द्वितीयमिव जीवितम् // 14 // धनश्री नमित्रस्य पद्यश्रीरपि गेहिनी / तयोस्तु तस्य पद्मश्रीः प्रेमसर्वस्वसूरऽभूत् // 15 // सपत्न्योः कलहेऽन्येद्युस्तयोज्येष्ठाऽवदल्लघुम् / पतिवाल्लभ्यगर्वेण किं भग्ने भज्यसे वृथा // 16 // सत्यवत्या इव तवाप्यर्थे किं ? दन्तमन्दिरम् / क्रियते पतिवाल्लभ्ययशस्तूपसहोदरम् / / 17 / / पद्मश्रीरत्रवीदाः किं हताशे ! दह्यते भृशम् / स्वाधीनपतिकैश्वयं दृष्ट्वा मे भुवनोजितम् // 18 // किश्च स्यान्मे न चेद्दन्तप्रासादस्तन्निये ध्रुवम् / | उक्त्वेति मुक्त्वा राटिं सा सद्यः कोपगृहेऽविशत् / / 19 // सम्प्राप्तो धनमित्रोथाऽपश्यन् पद्मश्रियं गृहे / ज्ञात्वा परिजनात्कोपसमन्यागच्छदुत्सुकः // 20 // प्रम्लातामङ्कमारोप्याप्राक्षीत्कोपस्य कारणम् / सा प्रोचे दन्तप्रासादः क्रियतां क्रीडितु मम // 21 // न चेदऽवश्यं स्वप्राणान् जुहोमि ज्वलितानले / नित्यमृत्युस्तु जीवन्त्याः पिशुनाङ्गुलिदर्शनैः // 22 // ऊचे स राजद्विष्टेऽथै विज्ञे ! कोऽयं तवाग्रहः / साऽब्रवीत्प्रलयेप्येषा प्रतिज्ञा नान्यथा मम // 23 // आयादत्रान्तरे तत्र दृढमित्रोऽथ तां तथा / दृष्ट्वा पृष्ट्वा विदिखा प्रयुक्त्या प्रावोधयच्च ताम् // 24 // न सा निजमपस्मारं विससर्ज कथञ्चन / को वा स्त्रीबालमूढान्धान् ग्रहं त्याजयितुं प्रभुः // 25 // विमृश्य दृढमित्रोऽथ धनमित्रमदोवदत् / पद्मश्रीः म्रियतेऽवश्यं तां विना ते क्व ? जीवितम् // 26 // त्वामृते मृत एवाहं तदनथे // 56 //