________________ श्रीअमम // 246 // जिनचरित्रम् स्वप्नार्थ निर्णये नलप्राप्तिनिराशा भैम्या : पत्रपुष्पफलोंज्वलम् // 45 // स्वैरं च तत्फलान्यादं भंगीसंगीतितोषिता / वन्येभोन्मूलितात्तसादकस्माचापतं भुवि // 46 // युग्मम् // भीता ततोऽतिसम्भ्रान्ता नाथ नाथेति वादिनी। भैमी यावजजागारारुद्राक्षीत्तावन्नलं नहि // 47 // स्वमसत्यापनायेव ततः | सा मूच्छिताऽपतत् / आश्वासि शीतैश्च गिरिपवनैः स्वजनैरिव // 48 // मृगीवद्दयितं देवाद्वियुक्तं सा ऽगवेषयत् / अलं नलं न पुंरूपं वनेऽपश्यद्विना तृणम् // 49 // दध्यौ च किं मां निर्भाग्यामेकां सत्यं नलोऽत्यजत् / आः शान्तं पापमथवा नीलीरागो ह्यसौ | मयि // 50 // तासां दैवतवाचां च तस्य प्रेमगुणस्य च / तेषामुत्कंठिताना चावसानं स्यात्किमीदृशम् // 51 // तन्नूनं स्याद्गतो | वक्रक्षालनाय स पल्वले / वनदेव्याऽथवा रुपलुब्धयाऽनायि मे प्रियः // 52 // नीखा कयापि खेचर्याऽवस्थानपणितोऽथवा / | देवितस्तस्थिवान द्याप्यायाति येन सः॥५३॥ ध्यात्वेत्युच्चैरुवाचैवं हि देव्यश्चेत्कुतूहलात् / नलो धृतोऽस्ति युष्माभिरास्तां किंतु प्रदर्यताम् // 54 // हे द्रुमाः पर्वताः शश्वजागरूकाधिपाः स्थ तत् / जहे मम प्रियः केनाप्युताऽगादिति कथ्यताम् // 55 // पुर:स्थितमिवावादीनलं स्वामिन्ममेप्सितम् / अग्रे सर्वमदास्तत्कि? वामात्रे कृपणोऽधुना // 56 // सैवं शून्योक्तिरभ्राम्यत्परं नाऽऽप प्रियं | क्वचित् / उदितैः कर्मभिः स्वास्थ्यं नीता स्वमं व्यचारयत् // 57 // चूतद्रुमो नलः पुष्पफलं श्रीराज्यवैभवम् / फलादनं राज्यभोगः | षट्पदोघः परिच्छदः // 58 // तरोरुन्मूलनं धात्रा राज्यातुनिमूलनम् / यत्तस्मात्पतनं मे तत् पतनं दयितादभूत् // 59 // स्वमार्था| दिति निर्णीय नलं दुर्लभदर्शनम् / सा व्यलापीद् भृतं दुःखैरुन्दंक्तुं हृदयं ध्रुवम् // 60 // हा स्वामिन् मां किमत्याक्षीनेदं सत्पुरुषव्रतम् / | पश्याद्यापि जडात्मापि कूर्मो नोज्झति मेदिनीम् // 61 // विपत्कष्टं कथं सोढेत्यौज्झीर्मा कृपयाऽथ चेत् / धिग्बुद्धिं तद्विगुणतां नीत्वा हा हारितं यशः॥२॥ हृदयस्थोऽसि मे नाथ ततो निर्यासि चेदलात् / तत्तेऽहं पौरुषं जाने पुरुषेष्वधिकं क्षितौ // 63 // सुप्तामे सर्ग-६ // 246 //