________________ // 245 // *-*-4888*488-8*489 | शस्त्रं यदलकर्मीणतां श्रयेत् // 27 // पतितः प्रेयसीप्रेम्णोऽभिमानस्य च संकटे / नाग्रे गंतुं नच स्थातुमुत्सहे हा करोमि किम् // 28 // तवृक्षांतरितः स्थित्वा रक्षाम्येतां विलोकयन् / असौ च अहं च यास्यावः प्रगे ज्ञप्तेप्सिताध्वनोः // 29 // विमृश्येत्यज्वलद्धष्टार्थ- स्वप्नदर्शनं वत्तरेव स क्रमैः / भूयो व्यभावयद्देव्याः स्वस्य चाचरणं हृदि // 30 // | भैम्याः __ कुलीनयानया नाहं त्यक्तो विपदि धीरया / त्यक्तेयं तु मया क्लैब्याद् धिग् द्वयोरंतरं कियत् // 31 // घृतासक्त्या राज्यनाशाहु: कीर्तिमसहं दुःखम् / तच्चूलिकां प्रियात्यागात्सहिष्येऽहं कथं ? पुनः // 32 / / प्रियात्यागे दुर्मतिर्मे यदभृत्तदहं ध्रुवम् / मरिष्याम्यथ का *जीविष्याम्येवं दैवहतोऽपि चेत् // 33 // तदास्यमस्याः प्रेयस्याः पुनर्भीमनृपस्य च / राज्ञां च दर्शयिष्यामि दुःकर्ममलिनं कथम् / // 34 // अथवा कर्मराजस्य किंकराः प्राणिनोऽखिलाः / काऽतस्तत्परतंत्राणां तेषां चिंतोचिता भवेत् // 35 // त्रिभिः // मदेकजीविता प्रातामदृष्टांतिके स्थितम् / शंकित्वा मन्मृति प्राणैर्भुवमेषा विमोक्ष्यते // 36 // वंचित्वा तदिमां भक्तां रक्तां गन्तुं न युज्यते / | याहिबंधनं पंसां स्त्री स्वकर्मपरीक्षणे // 37 // एको नैरयिक इव विपन्नरकवेदनाः। सहे गत्वा त्वसौ तातमन्दिरे सुखमेधताम | // 38 // मयाऽऽज्ञा लिखितां वस्ने वीक्ष्य शाखा च मे मनः / त्यक्त्वाऽनिष्टमियं यास्यत्याशु श्रीभीमसन्निधौ // 39 // इत्थं कृत्वा दृढं स्वान्तं गमनायाकुले नले। रात्रिरन्तमगात्तस्य चिंतयेव समं तदा // 40 // ऐंद्री क्रोधारुणमुखी भैम्याः त्यागादिवाभवत / * तहुःखाद् द्यौरुरोदेव पतचाराश्रुभिस्तदा // 41 // तिलकाद्भावतो भैम्याः शीलेन्दोरपि भीतिमत् / तमो दुराशयव्याजानलखांतांतरे- 1 ऽविशत् // 42 // गोत्रादिभृतेनार्केण पक्षिकोलाहलच्छलात् / वार्यमाण इवोत्क्षिप्य करांस्तस्मादकृत्यतः // 43 // प्रबोधसमये देव्या | // 245 // स्त्वरितत्वरितैः पदैः / मानश्रियं पुरस्कृत्य स्थानात्तस्माद्ययौ नलः // 44 // दवदंत्यपि राज्यंते खममेवं व्यलोकयत् ।यदारोहमहं चूतं 8 3-8-*18-2248386