________________ गिरितटे सोमश्रीपरिणयनम् * तया / सार्द्ध क्रीडन्नपत्रीडमब्दकालात्ययेऽन्यदा // 11 / / विद्याः साधयितुं दिव्या ग्रहितुं चौपधीरपि। हीमन्तं पर्वतं यातः खेचरान् | // 19 // *खे व्यलोकयत् // 12 // युग्मम् // ऊचे कान्तां स तां विद्यादानाचं मे गुरूभव / साऽप्यामेत्यूचुपी निन्ये तं हीमति गिरी क्षणात् // 13 // |शौरि रिरंसु विज्ञाय विज्ञा सा कदलीगृहम् / विकृत्याऽरमयत्तत्रेङ्गितज्ञा हि स्त्रियः क्वचित् // 14 // साऽपश्यत्रस्यदेणाक्षी तत्रैकमथ केकिनम् / रम्यः कलापिनोऽस्याहो कलाप इति कौतुकात् // 15 // जल्पन्ती स्वयमानेतुं तमधावत दूरतः / मयूरव्यंसकस्तां तु स | हखाऽदृश्यतां ययौ // 16 / / युग्मम् / / तत्पृष्ठे धावितः शौरिः सायं गोकुलमागमत् / गोपीभिः सत्कृतस्ततः क्षणदामनयत्सुखम् // 17 // | याम्यां प्रत्यचलत्प्रातामे गिरितटे गतः / गुरुं वेदध्वनि तत्र श्रुत्वाऽग्राक्षीच्च स द्विजम् // 18 // किमत्राधीयते वेदा न खेदाः श्रोत्रिKE | याङ्गजाः / सर्वत्राऽहनिश बद्धस्पर्द्धाः सोऽप्येवमाख्यत // 19 // युग्मम् // दशग्रीवस्य समये नारदाय महर्षये / स्वां पुत्री खेचरोऽदत्त |* रूपरम्यां दिवाकरः // 20 // सुरदेवोऽस्ति तद्वंश्यो ग्रामेऽस्मिन्नायको द्विजः / क्षत्रियायास्तस्य पत्न्याः सोमश्रीरिति चात्मजा // 21 // अतिप्राज्ञतया सैकसंस्था वेदान् स्वकण्ठसात् / चक्रे सांगानुपश्रुत्याऽप्यपरेव सरस्वती // 22 // नैमित्तिकः करालाख्यः पृष्टस्तजनकेन | च / वेदेवस्या विजेतारं परिणेतारमाख्यत // 23 // पापठीत्यत्र तां जेतुं लोका वेदांस्ततोऽनिशम् / ब्रह्मदत्तश्चास्ति वेदोपाध्यायो ब्रह्ममूत्तिभृत् // 24 // श्रुत्वेति यादवो विप्रीभूय विद्याबलादथ / उपाध्यायमुपस्खायाभिवाचैवमयोचत // 25 // नाम्नाऽहं गौतमो विप्रः स्कन्दिलस्त्वामुपागमम् / उपाध्यायाधिजिगांसुर्वेदानऽध्येतवत्सलम् // 26 / / ततः सोऽध्यापयद् वेदांस्तं स्वपुत्रमिवात्मना / तनिष्णा तोऽभवद् दुन्दुरप्यल्पैदिवसैः सुधीः // 27 // द्वेधापि स्मृतिभूर्वेदरहस्येषु विजित्य सः / स्वरनिर्णयसंक्षुब्धां सोमश्रियमुपायत // 28 // ao स तया सार्द्धमन्येधुरुद्याने गात्कुतूहली / इन्द्रशर्माभिधं तस्मिन्नन्द्रजालिकमैक्षत // 29 / / दृष्ट्वा चित्रकरी विद्यां शौरिस्तस्मादमार्ग // 19 //