________________ श्रीश्रमम जिनचरित्रम् मेरोरागत्य // 170 // विष्णु कुमारेण नमुचेः विज्ञप्ति करणम् | सत्वरम् / यः स्थास्यति हनिष्यामि तमहं नन्वऽहंयवः // 17 // सूरिरप्येवमवदत् कल्पाभावाद्वयं नहि / तवाऽभिषेके भोःप्राप्ता न विरु द्धतया पुनः // 18 // प्राणिवर्गे निसर्गेण न विरुद्धकृतो वयम् / सतां रक्षितरि क्षोणीनायके तु विशेषतः // 19 // क्रोधेन स पुनः प्रोचे कृतमाचार्य ! डम्बरैः / सप्ताहात्परतो वोऽत्र तिष्ठतां चौरनिग्रहः // 20 // इत्युक्त्वा नमुचौ याते स्वस्थानं सुरिरप्यथ पप्रच्छ ae साधून किं ? कत्तुं साम्प्रतं ब्रूत साम्प्रतम् // 21 / / साधुर्बभाषे तत्रैकः पद्मराजाग्रजो मुनिः / षष्टिवर्षशतीं विष्णुकुमारस्तप्तवांस्तपः // | // 22 // साम्प्रतं मन्दरे सोऽस्ति तस्यैव वचनादयम् / नमुचिः शमिताऽमुष्य खामी यत्सोऽपि पद्मवत् // 23 / / युग्मम् / / यातु साधु स्तमानेतुं योऽस्ति चारणलब्धिमान् / संघकार्य न दोषाय लब्धीनामुपयोजनम् // 24 // साधुरेकोऽवदन्मेरौ गन्तुं व्योम्नाऽस्मि शक्तिमान् ESI नतु व्याधुटितुं तन्मे कृत्यमादिशतोचितम् // 25 // आनेता विष्णुरेव त्वामित्युक्तो गुरुणा ययौ / ताक्ष्यवनभसोत्पत्य विष्णोः पार्श्व स मन्दरे // 26 // विलोक्य विष्णुस्तं दध्यौ संघकार्य महद्धवम् / साधोलब्धिमतोऽपि स्यान्न वर्षास्त्रागमोऽन्यथा // 27 // स मुनिविष्णुमानम्याचख्यौ स्वागमकारणम् / तमादाय क्षणात्सोऽपि व्योम्नाऽऽगाद् हस्तिनापुरम् / / 28 // विष्णुर्नत्वा गुरून् साधुवृतो नमुचिमभ्यगात् / तद्वर्ज च ववन्देऽसौ विनफ्रेः पार्थिवादिभिः // 29 // तं स सात्वधर्मकथापूर्वकं विष्णुरुक्तवान् / तिष्ठन्तु मुनयोऽत्रैव | कार्तिकान्तममी पुरे // 30 // वर्षासु बहुजीवासु कल्पते विहृतिनहि / एते तदन्ते नैकत्र वसन्ति स्वत एव च // 31 / / पुरे गुरुतरेऽमुष्मिन् पद्माकर इवालिभिः। स्थितरस्मादृशैभिक्षाजीवैः का ? ते क्षतिर्वद // 32 // नृपैराराधिताः प्राच्यैर्भरताद्यमुनीश्वराः। न तथा वर्तसे चेत्वं देहि स्थातुं तदप्यहो // 33 // तेनैवं जलदेनेव शीतैक्य लैरिव / मन्त्री प्रशमितोप्यौर्व इवाऽऽज्वालीत् क्रुधाऽधिकम् // 34 // वावच्यते स्म च वचः किञ्चिद्वाच्यं मुने! नहि / स्वराज्यसीम्नि वस्तुं वः कथश्चन ददामि न // 35 // द्वेधा विष्णुः प्रभ सर्ग-५ // 17 //