________________ // 125 // प्रथम जिते सद्यः स्फुरत्संवेगवेगतः। सहस्रं भूभुजस्तत्र तदानीं प्रावजन्मदा // 34 // प्रभु स्तुत्वा प्रणम्यागात् स्वस्थानं सुव्रतो नृपः / | इन्द्रास्त्वष्टाह्निकां नन्दीश्वरे कुखा ययुर्दिवम् // 35 / / सुरैरिवेन्द्रो नक्षत्रैरिवेन्दुस्तैस्तपोधनैः / अशून्यसन्निधिस्तत्रैवाऽस्थात्पतिमया ब्रह्मदत्त| विभुः // 36 // दृष्ट्वा प्रभोस्तपस्तेजस्तमःस्तोमक्षयक्षमम् / सज्जलज्ज इवाऽमजत् तदाब्धौ पश्चिमे रविः / / 37 / / प्रसन्नेन्दुमुखी ज्योत्स्ना नृपगृहे | श्रीचन्दनविलेपना / यामिनी कामिनीवाऽऽगाद्दीप्ता नक्षत्रमालया // 38 // तया कामिजनस्येव मनः क्षोभयितुं प्रभोः / जरत्येवाश-* पारणम् क्नुवत्या स्वयमेव व्यलीयत // 39 / / उत्तार्य लवणं स्फारतारकच्छमना विभोः / ऐन्द्री दिगाददे सूर्यबिम्बमारात्रिकाकृतिम् // 40 // | द्वितीयेऽन्हि राजगृहे ब्रह्मदत्तनृपौकसि / भवाब्धितारण कर्तुं पारणं प्राविशन्जिनः // 41 // स्थितं तं प्रांगणे प्रेक्ष्य कल्पद्रुमिव जंग| मम् / हर्ष स रोमहर्षस्य व्याजादिभ्रद् बहिर्गतम् / / 42 // दृग्भ्यां हर्षाश्रुवर्षेण पाद्यमाद्यं प्रवर्तयन् / ववन्दे रभसोत्तालभालचुम्बित भृतलः // 43 // युग्मम् / / प्रभोः स कल्पनीयेन पाणिपात्रमपूरयत् / पायसेन प्रमोदेन मनस्तु युगपत्तदा // 44 // अहो दानमहो दान| मित्यघोषि सुरैर्मदा / आस्फालयद्भियोमान्तः स्पर्द्धया दिव्यदुन्दुभिम् // 45 / / गन्धाम्बुवृष्ट्या संस्नप्योत्तसिता पुष्पवृष्टिभिः / स्नैः श्रृंगारिता चेलोत्क्षेपैर्भूः पर्यधापि च // 46 // युग्मम् // समेत्य तत्र संभ्रान्ताः सुरासुरनरेश्वराः / ब्रह्मदत्तनृपायेति श्लाघन्ते स || सविस्मयाः॥४७॥ भवानिव भवेत्कोत्र पात्रं स्वर्मुक्तिसम्पदाम् / त्रिलोकीशोऽपि यद्दानपात्रमागाद् गृहे तव // 48 // लक्ष्मीः परेषां भृपानां वन्ध्या श्रेयःप्रमः पुनः / तवैवेति स्तुतिप्रीताः सर्वे जग्मुर्यथागतम् // 49 // त्रि०वि०॥श्रीब्रह्मदत्तराजापि रत्नैः पीठमबन्ध | यत् / तीर्थभृतं तीर्थकरपदमुद्रांकितक्षितौ // 50 // बिजहार ततोऽन्यत्र भगवानपि निर्ममः / पक्षीव पञ्जरान्मुक्तो वने वायुरिवाऽ // 125 // स्खलन् // 51 // सौम्यन्दः प्रतिमास्थायी मेने लेप्यमयोन कैः। आजानुलम्बिदोर्दण्डःश्वभ्रस्थोद्धारधीरिव // 52 // सर्वदोपत्यकान्ता