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श्रीविंशतिकाप्रकरणे
विशिका
॥१९॥
| दाणा तग्गमणं पुण पडिकमणं ॥८॥ सद्दाइएसु ईसिपि इत्थ रागाइभावओ होइ । आलोयणा पडिक्कमणय च एवं तु मीसं तु है।
१७ योग ॥९॥ असणाइगस्स पाय अणेसणीयस्स कहवि गहियस्स । संवरणे संचाओ एस विवेगी उनीयच्चो ॥१०॥ कुस्सुमिणमाइएसु विणाभिसंधीइ जो उ अइयारी । तस्स विसुद्धिनिमित्त काउस्सग्गो विउस्सग्गो ॥ ११ ॥ पुढचाइर्ण संघट्टणाइभावेण तह पमायाओ । अइयारसीहणट्ठा पणगाइतवो तवो होइ ॥१२॥ तवसा उ दुद्दमस्सा पार्थ तह चरणमाणिणो चव । संकेसविसेसाओ छेओ पणगाइओ तत्थ ॥ १३ ॥ पाणवहाईमि पाओ भावेणासवियम्मि सहसावि । आभोगेणं जइणो पुणो वयारोवणा मूलं ।। १४ ॥1
साहम्मिंगाइतेणाइभावओ सकिलेसभेएण । तक्खणमेव वयाणवि होइ अजोगी उ अणचट्ठा ॥ १५॥ पुरिसविसेस पप्पा पाब# विसेसं च विसयभेएण । पायच्छित्तस्संतं गच्छंतो होइ पारंची ॥ १६ ॥ एवं कुणमाणी खलु पावमलाभावओ निओगेण । सुज्झइ
साहू सम्मं चरणस्साराहणा तत्तो ॥ १७॥ अविराहियचरणस्स य अणुबंधो सुंदरी उ हवइत्ति । अप्पो य भयो पायं ता इत्थं होइ जइयव्वं ॥ १८ ॥ किरियाए अपच्चारे त्थाउ) जत्तवओ णावगारगा जह(य)। पच्छित्सवओ सम्मं तह पन्चज्जाए अइयारो ॥१९॥ एवं भावनिरुज्जो जोगह उत्तम इह लहइ । परलोंगे य नरामरसिवसुक्खं तप्फलं च ।। २०॥ इति प्रायश्चित्तविशिका १६॥
मुक्खेण जोवणाओ जोगो सव्वौवि धम्मवावारो। परिसुद्धो चिन्नेओ ठाणाइगओ विसेसेण ॥ १ ॥ ठाणुजन्यास-IA बणरहिनी ततम्मि पैचहा एसो । दुगमित्थ कम्मओगो तहा तियं नाणजोगो उ ॥२॥ देसे सध्वे य तहा नियमेणेसो चरितणी होइ । इयरस्स वीयमित्त इत्तोच्चिय केइ इच्छेति ॥ ३ ॥ इक्विको य चउद्धवा इत्थं पुण तत्तओ भुगर्यच्ची । इच्छापवित्तिचिरसिद्धिभेयओ समयनीईए ॥४॥ तज्जुत्तकहा पीईइ संगयाऽविपरिणामिणी इच्छा । सव्वत्थुवसमसारं तपालणमो पयत्तीओ ॥५॥ तह
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