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________________ अनगार यौवनके अनंतर प्राप्त होनेवाली मध्य अवस्थाकी ग्यारह श्लोकोंमें निंदा करते हैं। जिसमेंसे पहले संतानका पालन पोषण करनेकेलिये जिसके मनमें आकुलता लगी रहती है उसको धनकी आशासे किये गये कृषि आदि आजीविकाके उपायोंके करने में जो क्लेश प्राप्त होते हैं उनको बताते हैं- .. यत्कन्दर्पवशंगतो विलसति स्वैरं स्वदारष्वपि, प्रायोऽहंयुरितस्ततः कटु ततस्तुग्धाटको धावति । अप्यन्यायशतं विधाय नियमाद्भतु यमिडाग्रहो, वर्धिष्ण्वा द्रविणाशया गतवयाः कृष्यादिभिः प्लुष्यते ।। ७१॥ जो तुग्धाटक-अपत्यवर्ग युवा अवस्थामें आकर कामदवेके वशीभूत हो स्वदारमें भी-संभोगपत्नियों की तरह धर्मपत्नियोंमें भी स्वच्छन्द होकर विलास-क्रीडा करता है और इसीलिये जो अहंकारसे आविष्ट होकर १ ऐसा ही एक जगह नीतिमें भी कहा है: प्रथमे वयसि यः शांतः सः शांत इति मे मतिः। ..... . धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ (सम्पादक) संकल्परमणीयस्य प्रीतिसंभोगशोभिनः । । रुचिरस्याभिलाषस्य नाम काम इति स्मृतम् ॥ जो संकल्पमात्रसे ही रमणीय मालुम पडती और प्रीतिपूर्वक अच्छी तरह भोगनेमें ही जो शोभन मालुम पडती है ऐसी रुचिर-मनोज्ञ अभिलाषाका ही माम काम है। अध्याय
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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