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________________ अनगार ७७८ - इस प्रकरण के प्रारम्भमें प्रतिक्रमणका लक्षण बताते समय लिखा था कि नाम स्थापना आदि छह निमित्तोंसे होनेवाले अपराधके अथवा संचित हुए पापके दर करने को प्रतिक्रमण कहते हैं। अत एव नामादिकी अपेक्षासे प्रतिक्रमणके भी छह भेद होते हैं । इन्ही छह भेदोंका स्वरूप दो श्लोकोंमें बताते हैं: स्यान्नामादिप्रतिक्रान्तिः परिणामनिवर्तनम् । दुर्नामस्थापनाभ्यां च सावद्यद्रव्यसेवनात् ॥ ५९॥ क्षेत्रकालाश्रिताद्रागाद्याश्रिताच्चातिचारतः। परिणामनिवृत्तिः स्यात् क्षेत्रादीनां प्रतिक्रमः ॥ ॥युग्मम् । पापसंचय के कारणभूत नामोंके उच्चारणादिसे होनेवाले अथवा उनका उच्चारणादि करनेके लिये जो परि णाम होते हैं उनकी निवृत्तिको नामप्रतिक्रमणा कहते हैं । सराग स्थापनाके निमित्तसे होनेवाले परिणामोंकी निवृत्तिको स्थापना प्रतिक्रमण कहते हैं। हिंसादि पापोंसे युक्त भोज्यादि वस्तुओंके विषय में जो परिणाम होते हैं उनकी निवृत्तिको द्रव्यप्रतिक्रमणा कहते हैं। क्षेत्रके सम्बन्धसे लगनेवाले अतीचारोंकी तरफ परिणामों की प्रवृत्ति न होना अथवा उनकी तरफ यदि परिणाम प्रवृत्त होभीजांय तो निन्दा आदिके द्वारा उनकी निवृत्ति करनेको क्षेत्रप्रतिक्रमणा कहते हैं। इसी प्रकार कालके निमितसे लगनेवाले अतीचारोंकी प्रवृत्ति न होनेको अथवा होजानेपर उसके निवृत्त करनेको कालप्रतिक्रमणा कहते हैं। तथा रागद्वेष और मोह सम्बन्धी अतीचारोंसे आत्माके निवृत रखनेको भाव प्रतिक्रमणा कहते हैं। प्रतिक्रमण यह क्रिया है, उसके कर्ता कर्म करण और अधिकरणरूप कारक कौन २ हैं सो बताते हैं: अध्याय स्यात् प्रतिक्रमक: साधुः प्रतिकम्यं तु दुष्कृतम् । येन यत्र च तच्छेदस्तत्प्रतिक्रमणं मतम् ॥१॥
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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