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________________ स्वरूप भी में नहीं हूं। इसलिये हे अङ्ग! केवल शरीरके संसर्ग मात्रसे उत्पन्न हुए पुत्रादिकों के विषयमें तो मुझे ऐक्य-अभेदका भ्रम हो ही किस तरह सकता है? भावार्थ-द्रव्य और भावरूप वचन या मन तथा शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवाले माता-पिता भ्रा. ता भगिनी स्त्री पुत्र आदि सभी तत्त्वतः मुझसे भिन्न है और मैं उनसे भिन्न हूं। आत्मा ही अष्टाङ्ग सम्यग्दर्शनस्वरूप है इस बातको स्पष्ट करते हैं: यत्कस्मादपि नो बिभेति न किमप्याशंसति क्वाप्युप,क्रोशं नाश्रयते न मुह्यति निजाः पुष्णाति शक्तीः सदा । मार्गान्न च्यवतेऽञ्जसा शिवपथं स्वात्मानमालोकते, माहात्म्यं स्वमाभव्यनक्ति च तदस्म्यष्टांगसद्दर्शनम् ॥ १० ॥ सम्यग्दर्शन के निःशङ्कितत्व नि:कांक्षितत्व आदि आठ अंग माने हैं जिनका कि वर्णन पहले किया जा I चुका है। इन आठो अशोके होनेसे सम्यग्दर्शन पूर्ण माना जाता है। किंतु यह अष्टाङ्ग सम्यग्दर्शन मुझसे कोई मिन्न वस्तु नहीं है। बल्कि मैं ही अष्टांङ्ग सम्यग्दर्शन हूं। क्योंकि मैं निःशङ्क-निर्भय हूं, मुझे किसीसे भी भय नहीं होता । इहलोकभय परलोकमय अरक्षकमय अगुप्तिमय मरणभय वेदनामय और अकस्मात्भय । ये सात प्रकारकी जो भय बतलाई हैं वे आत्माको नहीं होती । जैसा कि कहा भी है कि:- .. रूपैर्भयंकरैवाक्यैतुदृष्टान्तसूचिमिः। । .. जातु क्षायिकसम्यक्त्वो न क्षुभ्यति विनिश्चलः ॥ इसी प्रकार आत्माको इस जन्ममें मोगोंकी और परभवमें इन्द्रादि पदोंकी आकांक्षा भी नहीं होती। न यह विष्टा आदि पदार्थों और क्षुधा पिपासा आदि मावों में ग्लानि ही करता है। किसी भी मिथ्या देव गुरु या.. शास्त्रमें वह मोहित-मुञ्छित भी नहीं होता । बल्कि जिनसे कर्मोंका संवर या निर्जरा हो सकती है, अथवा समस्त दर्शनके निःशङ्कितत्व निकाल जाता है। किंतु यह अष्टा से भी भय अध्याय
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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