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परानुग्रहबुद्धीनां महिमा कोप्यहो महान् । येन दुर्जनवाग्वज्रः पतन्नव विहन्यते ॥७॥
अनगार
____ अहो जिनको बुद्धि दूसरे अनुग्राह्य प्राणियोंके अनुग्रह -आपत्तिके निवारण करनेमें ही लगी रहती है ऐसे महापुरुषोंकी महिमा ही कोई -अनिर्वचनीय और महान है, जिससे कि स्वभावसे ही दूसरोंके अपकारके करनेवाले दुर्जनोंका वचनरूपी बज्न पडते ही नष्ट हो जाता है । वज्र इसलिये कि वह सहसा दारुण विनिपातका कारण और दुर्निवार है एवं सजनोंको महिमाकी महत्ताका कारण भी यह है कि उससे सभी प्राणियोंके अभीष्ट कार्यकी सर्वत्र और सर्वदा जो निष्पत्ति होती है उसमें प्रत्युपकारकी अपेक्षा नहीं रहती।
भावार्थ--दुर्जन लोग यद्योप इस ग्रंथका अनेक रूपसे अपवाद करेंगे; क्योंकि उनका स्वभाव ही निंदा करनेका है। फिर भी महापुरुषोंके प्रभावसे वह निंदा अवश्य ही नष्ट हो जायगी। क्योंकि सज्जनोंका स्वभावसे ही ऐसा माहात्म्य है।
अब यहांपर ग्रंथकार समासोक्ति अलंकारके द्वारा यह बताते हैं कि इस कलिकालमें मिथ्या उपदेशक बहुत ही सुलभतासे मिल सकते हैं; किंतु समीचीन उपदेशकोंका मिलना बहुत ही कठिन है । समासोक्ति अलंकारका लक्षण रुद्रट भट्टने इस प्रकार कहा है। -
सकलसमानविशेषणमेकं यत्राभिधीयमानं सत् ।
उपमानमेव गमयेदुपमेयं सा समासोक्तिः ॥ उपमेयके समान सब विशेषण देकर केवल उपमानका ही जहांपर इस तरहसे वर्णन किया जाय कि जिससे उपमेयका स्वयं बोध हो जाय, वहांपर समासोक्ति अलंकार कहा जाता है । जैसे
अध्याय