SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 666
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ संवेग रंगसाला |जह इंधणेण अग्गी, न तिप्पइ जलनिही जलनईहिं। तह जीवस्स न तित्ती, अत्थि तिलोए वि लद्धम्मि ॥८१६१॥ आहम्मइ मारिजइ, रुभइ भिजइ य निरवराहो वि । धणवं आमिसहत्थो, तत्थो पकूखीहि जह पकूखी ॥८१६२।। मायापिइपुत्तेसु वि, दारेसु वि नेय जाय वीसंभं । गंथनिमित्तं जग्गइ, रक्खतो सव्वरत्ति पि ॥८१६३॥ अंतोहत्तं डज्झइ, पुरिसो नढे सयम्मि अत्थम्मि । उम्मत्तो इव विलवइ, परिदेवइ कुणइ उत्कंठ' ॥८१६४॥ गंथस्स गहणरकूरवण-सारवणाई सयं करेमाणो। वक्खित्तमणो झाणं, उवेइ कह मुक्कमजाओ ॥८१६५।। अर्थासक्तस्य स्वरूपम् अर्थत्यागस्य गुणाः च । ॥६२८॥ गंथेसु गढियहियओ, होइ दरिदो भवेसु बहुएसु । गंथनिमित्तं कम्म, किलिट्ठहियो समाइयइ । एएहि दोसेहि, मुच्चइ मुंचंतओ मुणी अत्थं । परमऽब्भुदयपहाणं, पावेइ गुणाण पब्भारं सप्पबहुले अरण्णे, अमंतविजोसहो जहा पुरिसो। पावइ अणत्थमऽत्थं, धरंतओ तह मुणी वि परं रागो होइ मणुण्णे, गंथे दोसो य होइ अमणुण्णे । गंथच्चाएण पुणो, रागद्दोसा दुवे चत्ता सीउण्हदंसमसगाऽऽइयाण, दिनो परीसहाण उरो। तब्विणिवारणहेउ', अत्थं दरे चयंतेण निस्संगो चेव सया, कसायसंलेहणं कुणइ साहू । संगो कसायहेऊ, अग्गिरस व हॉति कट्ठाणि सव्वत्थ होइ लहुओ, रूवं वेसासियं भवइ तस्स । गरुओ य संगसत्तो, संकिजइ चेव सव्वत्थ १ गदिय = आसक्त । ॥८१६६॥ ॥८१६७॥ ॥८१६८॥ ॥८१६९।। ॥८१७०॥ ॥८१७१॥ ॥८१७२।। ॥६२८॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy