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________________ संवेगरंगसाला महिलानाम्नां निरुक्तयः महिलानां दोषाः च । ॥६१७॥ दिलृ पिन सब्भावं, पडिवाइ नियडिमेव उड्डेइ । गोहानिलुक्कमित्थी, करेइ पुरिसम्मि कुलजा वि ॥८०१४॥ तारिसओ णथि अरी, नरस्स अन्नो त्ति वुच्चए नारी। पुरिसं सया पमत्तं, कुणइ ति य वुच्चए पमया ॥८०१५॥ पुरिसम्मि अणस्थसए, विलायइ जेण तेण विलया सा। जोजेइ नरं दुकखे य, तेण जुबई य जोसा य ॥८०१६॥ अबल त्ति होइ ज से, न ददं हिययम्मि धिइत्रलं अत्थि। इय महिलानामाणि वि, चितिज्जताणि असुहाणि ॥८०१७॥ निलओ कलीए अलियाण, आलओ कुलहरं अविणयाणं । आयासस्स य वसही, महिला मूलं तु कलहस्स ॥८०१८॥ धम्मस्स परमविग्यो, पाउब्भावो य धुवमऽधम्मस्स । संदेहो देहस्स वि, हेऊ माणाऽवमाणाणं ॥८०१९॥ पीयं पराभवाणं, महिलाओ कारणं अकित्तीएं । अत्थाणं सव्वगमो, समागमो तह -अणत्थाणं ॥८०२०॥ दोग्गइमग्गो सग्गाऽप-वग्गमग्गे य अग्गला उग्गा । दोसाण नियाऽऽवासो, सव्व-गुणाणं पवासो य ॥८०२१॥ चंदो वि होज उण्हो, सीओ सूरो वि निबिडमाऽऽयासं। न य होज अदोसा भ-द्दिया य महिला सुकुलजा वि ॥८०२२॥ इच्चाऽई बहुदोसे, महिलाविसए विचितयंतस्स । पायं विरजइ मणो, महिलाहिंतो विवेइस्स ॥८०२३॥ जह जाणिऊण दोसे, बग्घाऽई एत्थ परिहरिजति । तह दट्टणं दोसे, महिलाहिंतो वि विरमेज ॥८०२४॥ कि बहुणा भणिएणं, दोसा महिलाकया इहं चेव । हेट्ठाणुसहिदारे, गणवइणा देसिया चेव ॥८०२५॥ जं सुद्धकारणकयं, कारणसुद्धीए सुज्झइ तयं तु । कत्तो अमेज्झघडियस्स, होज सुद्धी सरीरस्स ॥८०२६॥ देहस्स सुक्कसोभिय-मसुई उप्पत्तिकारणं जम्हा। ता देहो च्चिय असुई, अमेज्झघडिओ जहा घडओ ॥८०२७॥ ॥६१७॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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