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________________ संवेग रंगसाला विषयासकूतस्य आत्मनः उपमाः । ॥५५४॥ विसया विऊण 'विसया, दूरध्वगनियजिणाऽऽगमंऽकुसया। तणुरुहिरहरणमसया, भवंति दावियअणिट्ठसया ॥७१९६।। ।। सुचिरं पि तवो तवियं, चिन्नं चरणं सुयं च बहु पढियं । जइ ता विसएसु मई, ता तं ही! निष्फलं सव्वं ॥७१९७॥ सन्माणमणिमहग्ध', फुरंतचारित्तरयणचि चइयं । ओ! विसयचंडचरडा, लुटंति जीवभंडारं ॥७१९८॥ /सा तुंगिमा स तेओ, तं विन्नाणं गुणा वि ते चेव । सव्वं खणेण नटुं, घिरत्थु विसयाऽऽमिलासस्स ॥७१९९।। हद्धी! अलद्धपुव्वं, जिणवयणरसायणं पि घोट्टेउ। विसयमहाहालाहल-हल्लोहलिएहि उग्गिलियं ॥७२००॥ सुहचरिए २अप्पाणं, पावा पावाऽऽसवेसु सप्पाणं । अप्पाणं अप्पाणं, विसयाण कए कयत्थिति ॥७२०१॥ चिट्ठइ दिह्रिविसगोयरम्मि, वग्गइ य तिकूरखरखग्गऽग्गे । असिपंजरम्मि कीलइ, सोयइ सत्तीए अग्गम्मि ॥७२०२।। बंधइ पडम्मि अग्गिं, मूढो नियमत्थएण हणइ गिरि। आलिंगइ सुहुयहुया-सणं च विसमऽसइ जीयऽत्थी ॥७२०३॥ छुहियं सीहं कुवियं च, पन्नगं सुबहुमच्छियं च महं। आहणइ सो अणजो, जो विसएसुं कुणइ गिद्धिं ॥७२०४॥ अहवा विसं मुहे च्चिय, खंधे चिय सुनिसिओ असी तस्स । गत्ता मुहपुरओ चिय, उच्छंगे चिय कसिणसप्पो ॥७२०५।। पासडिओ च्चिय जमो, हियए च्चिय तस्स जलइ पलयऽग्गी । मूलनिलीणो य कली, विसएसु जस्स किर गिद्धी ॥७२०६॥ अहवा नियवत्थंऽचल-गंठीबद्धं खु धरह सो मरणं । सोयइ य निस्सहंऽगो, चलंतकुड्डयलपासाए ॥७२०७।। उवविसइ स मूलाए, पविसइ य जलंतजउहरस्संऽतो। कुंतऽग्गम्मि य नच्चइ, करेइ विसएसु जो गिद्धिं ॥७२०८॥ १ विषदाः । २ अप्राणम् = बलरहितम् । ॥५५४॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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