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संवेगरंगसाला
|विषयद्वारस्वरूपम् ।
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ताहे विम्हइयमणेण, राइणा पुच्छिओभयकुमारो। कत्तो एत्तियमेत्ता, धणरिद्धी पुत्त ! पत्त ति ॥७१६९।। तेणावि मंसजवतिग-मग्गणपमुहो उ सव्ववुत्तंतो। सिट्ठो जहडिओ सेणि-यस्स विम्हइयहिययस्स ॥७१७०॥ अच्चतमहग्धत्तं, सुदुल्लहत्तं च तयऽणु मंसस्स । रना निव्वभिचारं, पडिवन सेसएहि ति (पि) ॥७१७१।। इय सोऊणं सम्मं, मंसस्साऽऽसेवणं पुरा वि कयं । आराहणाकयमणो, मुणिवर ! मा संभरेज तुम ॥७१७२।। एवं पसंगपाविय-मंसाऽऽइसरूवकहणसंबद्धं । भणिऊण मजदारं, विसयद्दारं पवकूखामि
॥७१७३॥ पुव्वं अणंतरं चिय, जे दोसा मजगोयरा भणिया। पाएणं विसएसु वि, ते चेव भवंति सविसेसा ॥७१७४॥ जम्हा उ विसेसेणं, सीयंति इमेसु कयमणा मणुया। एएण कारणेणं, विसयत्ति निरुत्तमेएसिं ॥७१७५॥ एए उ महासल्ल', इमे महासत्तुणो परे लोए । एए उ महावाही, एए उ परमदारिदं
॥७१७६॥ सल्लं' हिययनिहितं, न सुहेल्लि देइ देहिणो उ जहा । अंतो विचिंतिया तह, विसया वि दुहाऽऽवहा चेव ॥७१७७।। जह नाम महासत्तू, दावेइ कयत्थणाओ विविहाओ। एमेव य विसया वि हु, अहवा एए परभवे वि॥७१७८|| जह नाम महावाही विहुरत्तं कुणइ इहभवम्मि तहा । विसया वि नवरमेए, भवंतरेसु वि अणंतगुणं ॥७१७९॥ ठाणं पराभवाणं, सव्वाण जहेह परमदारिदं । विसया वि किर तह च्चिय, पराभवाणं परं ठाणं ॥७१८०॥ पत्ताई पावेंति, पाविस्संति य बहूणि बहवो वि । परिभवपयाई पुरिसा, ते जे विसयाऽमिसपसत्ता ॥७१८१॥ मन्नइ तणं पिव जगं, संदेहपए वि पविसइ विसइ । मरणस्स वि देइ उरं, अपत्थणिज पि पत्थेइ ॥७१८२।।
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