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________________ संवेगरंगसाला नृपकृतपुरुषानुगमनम् ॥१६॥ ताव पुरिसेण तेणं, दरदलियकवालमीसि हसिऊण । नरनाह मात्तूगं, थंमियमवरं बलं सयलं ॥१६६॥ राया वि चित्तलिहियं व, पेच्छिउं तं समग्गमवि सेन्नं । परिचिन्तिउंपवत्तो, अच्चन्तं विम्हयाउलिओ ॥१६७॥ अहह महापावो कह, एवंविहमंतसत्तिसं जुत्तो । कह वा विबुवहनिसिद्धं, अकजमेवविहं कुणइ ॥१६८॥ मन्ने एरिसग च्चिय, ते वि हु थंभाइकारिणा मंता । तेणन्नोन्नाणुगमो, समसीलत्तेग जाओ सिं ॥१६९॥ अहवा किमणेग विचिंतिएण, सुमरामि थंभणि विज । एयस्स थंभणठ्ठा, चिरपढियं सुगुरुमूलम्मि ॥१७॥ तो सवंगनिवेसिय-रक्खामंतवखरोऽनिलनिरोहं । काउं नासापेरंत-निमियथिरलोयगंबुरुहो ॥१७॥ पउममयरदसंदोह-सुंदरुद्दामपसरियमऊहं । थंभणकरपरमक्खर-मारद्धो सुमरिउ राया ॥१७२॥ अह खणमेत्तमि गए, तत्तोहुत्तं पलोयए जाव । दरपहसिरेण तेणं, पजंपियं ताव पुरिसेण ॥१७३॥ हे नरवर ! जीव चिरं, पुवं मंदा गई ममं हुंता । तुह थंभणविजाए, संपइ पवणोवमा जाया ॥१७४॥ ता जइ कज्जं भजाए, अस्थि एजाहि सिग्घवेगेण । इय सो पयंपमाणो, तुरियं गंतु पयट्टो त्ति ॥१७५॥ अहह कहं चिरसिक्खिय-विजा वि हु विहलिया ममेयाणिं । विहलिजउ अहव परं, मोत्तूण परक्कम एकं ॥१७६॥ इय चिंतिऊण राया, अविचलचित्तो पढिउच्छाहो । खग्गसहाओ सहसा, लग्गो तस्साणुमग्गेण ॥१७७॥ एसो वच्चइ राया, एसा देवी इमो य सो पुरिसो । इय जंपिरे जणम्मि, ताणि गयाई सुदरपहं ॥१७८|| पइसमयकसाहयतरल-तुरयलहुभूरिलंघियद्धाणो । थेवंतरेण राया, जाव न त पावइ मणुस्सं ॥१७९॥ -॥१६॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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