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संवेगरंगसाला
जिनस्य प्रशंसया कृष्णकृता ढणकुमारस्य वन्दना ।
॥५३३॥
विहरंतस्स य तं पुन्व-जम्मनिव्वत्तियं अणिट्ठफलं । समुदिष्णमंतराइय-कम्म ढंढणकुमारस्स ॥६९१६।। तो तदोसेणं जेण, साहुणा सह भइ सो भिक्ख । उवहणइ तस्स लद्धिं पि, अहह ! भीमाई कम्माई ॥६९१७॥ एगम्मि अवसरम्मि, मुणीहि तदऽलाभवइयरे सिट्टे । मूलाओ चिय सिट्ठो, तव्युत्तंतो जिणि देण ॥६९१८॥ तं सो सो धीमं, अभिग्गहं गिण्हइ जिणसगासे । एत्तो परलद्धीए, अँजिस्समऽहं न कइया वि ॥६९१९॥ एवमऽविसष्णचित्तो, सुहडोव्व रणाऽवणि समल्लीणो। दुकम्मवेरिविहियं, दुक्ख थेवं पि अगणेतो ॥६९२०॥ निव्वाणविजयलच्छिं, उवलधु विहियविविवावारो। उवभुत्तोऽमयवरभो-यणो व दिवसाई वोलेइ ॥६९२१।। अह अन्नया जिणि दो, पुट्ठो कंसारिणा भयवमेसि । साहूणं मज्झे को, दुक्करकारि त्ति वागरसु ॥६९२२।। तो भणियं जयगुरुणा, नणु दुक्करकारया इमे सव्वे । नवरं दुक्करकारी, एत्तो वि हु ढढणकुमारो ॥६९२३॥ बहुकालो वोलीणो, जम्हा एयस्स धीरहिययस्स । दुसहमऽलाभपरीसह-मसमं सम्म सहतस्स ॥६९२४॥ धन्नो कयपुनो सो, जं कित्तइ इय सयं जएकपहू । एवं परिभावंतो, जहाऽऽगयं पढिओ कन्हो ॥६९२५॥ पविसंतेण पुरीए, तेण य दिट्ठो कहिं पि दिव्ववसा । मिकूख भममाणो उच्च-नीयगेहेसु स महप्पा ॥६९२६॥ तो दराओ च्चिय करिवराओ, ओयरिय परमभत्तीए। धरपीढलुलंतसिरेण, वंदिओ सो सिरिहरेण ॥६९२७॥ तं महुमहेण वंदिज-माणमऽवलोइऊण इन्भेण । गेहट्ठिएण एकेण, चितियं विम्हियमणेण ॥६९२८॥ धण्णो एस महप्पा, जो एवं महिवेण भत्तीए। वंदिजइ सविसेस, देवाण वि वंदणिज्जेण
॥६९२९॥
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