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________________ संवेगरंगसाला ॥ ४१० ॥ ॥५२८९ ।। जस्स पियविप्पियपरे, परे समुक्करिसमऽहव अवकरिसं । न मणो मणयं पि हु भयइ, तस्स आया हु संथारा ॥ ५२८८ ।। दव्वे खेत्ते काले, भावे पडिबधवञ्जणुज्जुत्तो । सत्तेसु मेत्तिसारो, आय चिय होड़ संथारो / सम्मत्तनाणचारित्त-लकूखणा मोकूखसाहगगुणा जे । एत्थं खु संथरिज्जंति, तेण आया हु संथा अनेरुद्धाssसबदारो, अप्पागं न य धरेह सारम्मि । आरुहह य संथारं, अविद्धो तस्स संथारो जो गारवेहि' मत्तो, नेच्छा आलोयणं गुरुसगासे । आरुहइ य संथारं, अविसुद्धो तस्स संथारो / जो पुण पत्तभूओ, करेइ आलोयणं गुरुसगासे । आरुहइ य संथारं, सुविसुद्धो तस्स संथारो सच्चविगहाविमुको, सत्तभयट्ठाणविरहिओ धीमं । आरुहइ य संथारं, सुविसुद्धो तस्स संथारो नवभचेरगुत्तो, जुत्तो जो दसवहे समणधम्मे | आरुहइ य संथारं, सुविसुद्धो तस्स संथारो अट्ठमयट्ठाण विसंठुलस्स, निधसस्स लुद्धस्स । उवसमविउत्तचित्तस्स काहि किमिह संथारो रागी दोसी मोही, कोही माणी य मायवं लोभी । जो सो संथारत्थो वि, नेय संथारफलभागी अनिरुद्धजोगपसरा, सव्वंऽगं जो असंकुडप्पा य । परमत्थसाररहिओ, कह सो संथारफलभागी जता गुणरहिओ वि हु, संधारत्थो समीहए मोकुखं । तो पहियदमगसेवग - जणाण पढमं हवउ मोकूखो बज्झतरगुणहीणो, बज्झतरदोसदूसियऽप्पा य । संथारत्थो न वि थेव - मवि फलं लहइ स बराओ बज्झतरगुणकलिओ, बज्झतर दोसदूरवत्ती य । संथारगऽणुवविट्ठो वि, इदुफलभायणं होड़ ॥५२९०॥ ।।५२९१।। ।।५२९२ ॥ ।।५२९३॥ ।।५२९४ ॥ ।।५२९५।। ॥५२९६॥ ।।५२९७॥ ।।५२९८ ।। ।। ५२९९ ।। ||५३०० || ॥५३०१ ॥ संस्तारक स्वरूपम् । ॥ ४१० ॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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