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संवेगरंगसाला
आलोचनायाः चतुर्थादिनवमपर्यन्तदोषाणां स्वरूपम् ।
॥३८३॥
बायरवडवराहे, जो आलोएड सुहमए नेय । अहवा बहुमे वियडइ, वरमन्नतो उ एवं तु ॥४९२४॥ जो सुहमे आलोयह, सो किह नाऽऽलोए बायरे दोसे । अवा जो बायरए, वियडइ सो किन सुहुमे उ॥४९२५।। वायरमाऽऽलोएइ, वयभंगो जत्थ जत्थ से जाओ। पच्छाएइ य सुहमं, चउत्थओ वियडणादोसो ॥४९२६।। जह कंसियभिगारो, अंतो मइलो वि सुद्धओ बाहिं। अंतो ससल्लदोसा, सल्लविसोही तहेसावि ॥४९२७॥
केवलइ च्चिय सुहुमे, आलोयइ थूलए उ गोवेइ । भयमयमायासहिओ, भवइ य सो पंचमो दोसो ॥४९२८॥ रसपीयलं व कडयं, जह वा जुत्तीसुवन्नकडयं च । जह व जउपूरकडयं, सल्लविसोही तहेसा वि ॥४९२९।। जइ मूलगुणे उत्तर-गुणे य कस्सइ विराहणा होजा । पदमे बीए तइए, चउत्थए पंचमे च वए ॥४९३०॥ को तस्स दिजइ तवो, इय पच्छन्न पपुच्छिउ कुणइ । सयमऽवि पायच्छित्त, छट्ठो आलोयणादोसो ॥४९३१॥ अहवा आलोईतो, छन्न आलोयए जहा नवरं । निसुणेइ अप्पण च्चिय, न परो छट्ठो भवइ एवं ॥४९३२॥ मयतण्हाओ उदयं, इच्छह कूरं व चंदपरिवेसे । जो सो इच्छइ सोहिं, अकहेंता अप्पणो दोसे ॥४९३३॥ पकिखय-चाउम्मासिय-संवच्छरिएसु सोहिकालेसु । सदाऽउले कहेइ, दोसे सो होइ सत्तमओ ॥४९३४।। अरहट्टयडीसरिसी, अहवा २वुदंछिओवमा होइ । भिन्नवडसरिच्छा वा, सल्लविसोही इमा तस्स ॥४९३५॥ एकस्साऽऽलोइत्ता, जो आलोए पुणो वि अन्नस्स । ते चेव उ अवराहे, तं होइ बहुजणं नाम ॥४९३६॥ . १ केवलइ - केवलान् । २ वुदछि औषमा = यथा वृन्दे भुतं न गण्यते तथा इति प्रतिभाति B |
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