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संवेगरंगसाला
महिलानां दोषाणां स्वरूपम् ।
॥३४४॥
ओसहिवस-अविणस्सिर-भुयरुहिर पाइया य नरवइणा। मा बाहेजति विचिं-तिरेण अच्छीणि ठइऊण ॥४४२५।। पुणरवि छुहाभिभुया, ऊरु छेत्तुं असाविया मंसं । संरोहिणीए ऊरू, पुणन्नवो तकखणं च कओ ॥४४२६॥ पत्ताणि दूरनयरे, तस्साऽऽभरणेहिं नरवई ताहे। नीसेसकलाकुसलो, वाणिज काउमाऽऽदत्तो ॥४४२७।। दिन्नो य तीए बीयो, पगू णेणं सुनिम्वियारो त्ति । गीयच्छलियकहाऽऽईहि, नवरि तेणऽजिया देवी ॥४४२८।। जाया तदेगचित्ता, भत्तारोवरि गया पओसें च। अवरम्मि अवसरम्मि, उज्जाणगओ सुवीसत्थो ॥४४२९॥ जियसत्तू पाइत्ता, पभूयतरमैइरमऽमरसरियाए । पक्खित्तो किर तीए, तं पंगुलमऽभिसरंतीए ॥४४३०॥ इय निययम'ससोणिय-पणामणेणं पि पीणियंऽगीओ। विस्सुमरिओवयाराओ, निति निहणं हयाऽऽसाी ॥४४३१॥ पाउसकालनईउ व्व, जाओ निच्च पि कलुसहिययाओ। धणहरणकयमईओ, चोरो ब्व सकअगरुयाओ ॥४४३२॥ बग्धि व्व घोररूवाओ, ताओ संझ व्व चवलरागाओ। मयभिभलाओ णिच्च, गयाऽऽवलीओ व्व महिलाओ ॥४४३३।। अलिएहिं हसियभणिएहि, अलियरून्नेहि अलियसवहेहिं । विवसं कुणंति चित्तं, नरस्स सुवियकखणस्सावि ॥४४३४।। महिला पुरिसं वयणेहि, हरइ हियएण हणइ निकरुणा। अमयमइया व वाया, विसमयमिव होइ हिययं से ॥४४३५।। रसोयसरि दुरियदरी, कवडकुडी महिलिया किलेसकरी। वइरविरोयणअरणी, दुकखरखणी सोकरखपडिवक्खा ॥४४३६॥ एत्तो चिय मायरमभवि, ससं पि धूयं पि नेव एगते। भासिं ति महासत्ता, मा सवियार मणो होहि ॥४४३७॥
१ अजिया = वशीकृता । २ सोयसरि = शोकसरिन् ।
॥३४४॥