SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 295
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ संवेग रिष्टैः मरणकालज्ञानम् । रंगसाला ॥२५३॥ जस्स य सुक्का विट्ठा, निट्ठयं च लहुं बुड्डइ जलंमि। सो पुरिसो मासेणं, पासेणं बच्चइ जमस्स ॥३२४९॥ जूया व मच्छिया वा, निरंतरं ज भयंति पच्छा वा। उवसप्पंति य तं काल-कवलियं कुसल! कलसु लहु ॥३२५०॥ विज्जु पुरंदरचणु', धणियमऽमेहे वि नहयले नियइ । सुणइ य गज्जियसई, जो सो लहु जमपुरपवेसी ॥३२५१।। जस्स सिरे कागोलूग-कंकणमुहा पलासिणो विहगा। सहसाऽऽवडंति सो जाइ, जमगिहे थोबदिवसेहिं ॥३२५२।। विच्छाए पेच्छतो, रविससितारागणे जियइ वरिसं। अह सव्वहा न पेच्छइ, अच्छइ छम्मासमेव जइ ॥३२५३।। तह ससिरविबिंबाण, भूपडणं पासइ अकम्हा जो। निस्संसयं वियाणसु, बारस दिवसाणि तस्साऽऽउ ॥३३५४॥ जो पुण दो रविविबे, पासइ नासइ स मासतियगेण। रविबिम्बमंऽतरिच्छे, पेच्छइ भमिरं अह लहु ता ॥३२५५।। सूरस्स अप्पणो वा, जो जुगवं नियइ चउसु वि दिसासु । रविबिम्बाणि तदाउ, दिणाण घडियाण व चउक्कं ॥३२५६।। सव्वंग व नियंतो, छिडे मायंडमंडलमकडे। नणु सग्गमग्गलग्गो, दसदिवसऽब्भन्तरे नेओ ॥३२५७।। जियइ तिदिणं स सव्वं, पासइ पीयं पयत्थसत्थं जो। जस्स य कसिगं भिन्न', हवइ पुरीसं स लहुमरणो॥३२५८|| बद्वद्धचकूखुलक्खो , निरिकूखमाणो वि न य नियं नियइ । भुमयाण जुयं जो सो, नवदिवसऽभतरे मरइ ।।३२५९।। भालुवरि धरियहत्थो, पयइत्थं चेव नियइ मणिबंध। जो न पुण अइकिसतरं, तरसा सो वि हु मरणसरणो ॥३२६०॥ न नियइ नियनयणाणं, अग्गंऽगुलिघट्टियच्छिपेरंतो। जो जोई जाइ जमा-ऽऽणणं स नियमा दिणतिगंऽते ॥३२६१॥ वामऽच्छिणो न पेच्छइ, अह रुद्धाऽबंगकोणजोई जो। तपि कमेण वियाणसु, छत्तिदुमासेकमासाऽऽउ ॥३२६२।। ॥२५३॥ स. रं. २२
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy