________________
संवेगरंगसाला
॥२२२॥
चोयग आह
जं चिय पए निसिद्ध ं तं चिय जड़ कप्पई पुणो तस्स । एवं होइ अणवत्था, न य तित्थं नेय सच्च तु ॥२८४६॥ उम्मत्तवायसरिसं खु, दंसणं न विय कप्पडकप्पं तु । अह ते एवं सिद्धी, न होज्ज सिद्धी उकस्सेवं ॥२८४७॥ आयरिय आह
न वि किंचि अणुन्नायं, पडिसिद्ध वा वि जिणवरिं देहि । एसा हु तेसिमाऽऽणा, कज्जे सच्चेण होयव्वं ॥२८४८|| किंच
दोसा जेण निरूभंति, जेण खिअंति पुव्वकम्माई । सो सो मोक्खोवाओ, रोगावस्थासु समणं व उज्जुयमग्गुस्सग्गो, अत्रवाओ तस्स चेत्र पडिवक्खा | उस्सग्गा विणिवइयं धरेइ सालं मनवाओ धावतो उच्चाओ, मग्गन्नू किं न गच्छति कमेण । किं वा मउई किरिया, न कोरई असहओ तिकूखं उन्नयमवेक्ख निन्नस्स, पासिद्धी उन्नयस्स निन्नाओ । इय अन्नोनपसिद्धा, उस्सग्गऽववाय दो तुल्ला जावइया उस्सग्गा, तावइया चेव होंति अववाया । जावइया अववाया, उस्सग्गा ततिया देव सहाणे सहाणे, सेया बलिणो य हो ति खलु एए । सट्ठाणपरडाणा य, होति वत्थूउ निफन्ना संथरओ सङ्काणं, उस्सग्गो असहुणो परट्ठाण । इय सड्डाण परं वा, न होइ वत्युं विणा किंचि अववाओ वि ठियस्स हु, गीयरस य पुट्ठकारणे नेओ । अलम इपसंगभणणेण, पत्थुयं चैव अह भणिमो ॥२८५६ ॥
।। २८५५।।
॥२८४९ ॥
॥२८५०॥
॥ २८५१ ।।
||२८५२||
।। २८५३ ।।
॥२८५४ ॥
कल्पयाकल्प्य विषये प्रश्नोत्तरम् उत्सर्गापवाद
स्वस्थानपरस्थानादीनां
च
॥२२२॥