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________________ संवेगरंगसाला सामायिका| दिप्रतिमानां स्वरूपम् । ॥२१५॥ इय तइयाए सम्मं, करेइ सामाइयं स पडिमाए । मणदुप्पणिहागाई, तहाईयारे य परिहरइ ॥२७५२॥ पुवप्पडिमाजुत्तो, उद्यमीमाईसु पव्वदियहेसु । पडिवाई चउत्थीए. पोसहं चउविहंपि गिही ॥२७५३॥ अप्पडिदुप्पटिलेहिय-सज्जासंथारगाऽऽइ वज्जेइ । सम्मं च अणणुपालण-माऽऽहाराईसु एयाए ॥२७५४॥ अह पंचमपडिमाए, पोसहदिवसेसु एगराईयं । सो पडिम पडिवाइ, पुब्बोइयसव्वगुणजुत्तो ॥२७५५॥ असिणाणो दिणभोई, अबद्धकच्छो दिणम्मि कयबंभो । रत्ति परिमाणकडो, पडिमावज्जेसु दियहेसु ॥२७५६।। झायइ पडिमाए ठिओ, तिलोयपुज्जे जिणे जियकसाए । नियदोसपचणीयं, अन्नं वा पंच जा मासा ॥२७५७।। छट्ठीए बंभचारी, रत्ति पिस होइ नवरि सविसेसं । जियमोहो अविभूसो, ठाइ रहे सह न इत्थीहि ॥२७५८॥ चयइ य अइप्पसंगं, सिंगारकहं च जाव छम्मासा । पुब्धोइयपडिमासु, पडिबद्धमणो य अपमाई ॥२७५९।। सत्तमपडिमाए पुणो, सचित्तमाऽऽहारमेस परिहरइ । पुब्बोइयगुणजुत्तो, अपमत्तो सत्त जा मासा ॥२७६०॥ आरंभमट्ठमीए, सावज कारवेइ पेसेहिं । पुचपवत्तं न सयं, वित्तिकए अट्ठ जा मासा ॥२७६१॥ नवमीए पेसेहि वि, सावज' कारवेइ नाऽऽरंभं । धणवं संतुट्ठो पुत्त-मिच्चनिकिखत्तभारो ति ॥२७६२।। लोगववहारविरओ, थेवममत्तो य परमसंविग्गो । एसो पुव्वपवंचिय-गुणजुत्तो जाव नव मासा ॥२७६३॥ दसमीए तदुद्देसेण, जं कडं तंपि भुजइ न भत्तं । छुरकयमुंडो कोई, सिहाधरो वा हवेज गिही ॥२७६४॥ पुट्ठो य निहाणाई, सयहिं कहेज जइ स जाणेजा । पुन्वपडिमासमग्गो, दस मासा जाव विहरेजा ॥२७६५।। ॥२१५॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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