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________________ संवेगरंगसाला गुदोषपरीक्षा প্পিাसमाप्तिश्च । ॥१२५॥ एवं धम्मात्थिगिहत्थ-गोयरा इह विसेसविहिसिक्खा । वुत्ता एत्तो वुच्चइ, मुणिविसया सा समासेण ॥१५७८॥ नवरं समयविऊहिं, सा च्चिय भणिया विसेसविहिसिक्खा । जा किर पइदिणकिरिया, जईण पुण सा इमा नेया ॥१५७९॥ पडिलेहणापमजण-मिक्खिरियालोय जणा चेव । पत्तगधुवणवियारा, थंडिलमाऽऽवस्सयाऽऽइया ॥१५८०॥ जा वि य इच्छामिच्छ-प्पमुहा उवसंपयाऽवसाणाओ । सुविहियजणपाउग्गा, सामायारी दसपयारा ॥१५८१।। पढउ सयं पाढेउ य, परे वि तत्तं पि चितउ पयत्ता। जइ नत्थि विसेसविहिम्मि, आयरो ता मुणी वसणी ॥१५८२।। इय गुणदोसपरिकूख', काउं अवगम्म तह गहणसिक्ख । समणुसरेज अभिक्ख', सम्म आसेवणासिक्ख ॥१५८३।। एवं च सप्पभेओ-भयसिक्खजुओ हवेज धम्मऽत्थी। सव्वो वि सव्वया वि, कि पुण आराहणाचित्तो ॥१५८४॥ आराहणा वि न जओ, पायं तह सम्ममरिहइ होउ। एमेव अत्थिणो वि हु, पुव्वमऽणब्भत्थजोगस्स ॥१५८५।। तम्हा तदत्थिणा सव्वहा वि, एयासु भणियसिकखासु । जइयव्वं जत्तेणं, एत्तो य कयं पसंगण ॥१५८६॥ इय धम्मुवएसमणो-हराए, संवेगरंगसालाए । परिकम्मविहीपामोक्ख-चउमहामूलदाराए ॥१५८७॥ आराहणाए पनरस-पडिदारमयस्स पढमदारस्स । तइयं सिक्खादारं, समत्तमेयं सभेयं पि ॥१५८८॥ आराहगो न पुव्वुत्त-सिक्वदक्खो वि विणयविरहेण । होइ कयत्थो जत्तो, एत्तो बुच्चइ विणयदारं ॥१५८९॥ विणओ य पंचरूवो, परूवियो नाणदरिसणचरित्ते । तवविणओ य चउत्थो, चरिमो उवयारिओ विणओ ॥१५९०॥ "काले विणए बहुमाणे, उवहाणे तहा अनिन्हवणे । वंजण-अत्थ-तदुभए, विणओ नाणस्स अट्ठविहो" ॥१५९१॥ . ॥१२५॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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