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________________ नयचक्र सार मूळ ॥ १११ ॥ आत्मद्रव्यने विषे स्वधर्मनी अस्तिता छे, परधर्मनी नास्तिता छे, स्वगुणनो परिणमवो अनित्य छे अने तेज गुणपणे नित्य छे, तथा द्रव्य पिंडपणे एक छे अने गुण पर्यायपणे अनेक छे, तथा आत्मा कारणपणे कार्यपणें समय समयमां नवानवापणो जे पामे छे ते भवनधर्म छे तो पण आत्मानो मूलधर्म जे पलटतो नथी ते अभवनधर्म छे. इत्यादिक अनेक धर्म परिणति युक्त छे ए रीते षटू द्रव्यने जाणी निर्धारीने हेयोपादेयपणे श्रद्धान भासन धाय ते सम्यक ज्ञान, | सम्यक् दर्शन छे ए जीवनी अशुद्धता ते परकर्त्ता, परभोक्ता, परग्राहकता, टालवाना उपायनुं साधन ते साधन करवे आत्मा आत्मापणें मूलधर्मे रहे ते सिद्धपणो तेनी रुचि उद्यमपणो करवो एहिज श्रेय छे. स्यात् अस्ति, स्यान्नास्ति, स्यात् अवक्तव्यरूपास्त्रयः सकलादेशाः संपूर्णवस्तुधर्मग्राहकत्वात्, मूलतः अस्तिभावा अस्तित्वेन सन्ति, तथा नास्तिभावा नास्तित्वेन सन्ति एवं सप्तभङ्गाः एवं नित्यत्वसप्तभङ्गी अनित्यत्व सप्तभङ्गी एवं सामान्यधर्माणां, विशेषधर्माणां गुणानां, पर्यायाणां, प्रत्येकं सप्तभङ्गी तद्यथा ॥ अर्थ – स्यात् अस्ति स्यात् नास्ति स्यात् अवक्तव्य ए त्रण भांगा वस्तुना संपूर्णरूपने ग्रहे माटे सकलादेशी छे अने शेष रह्या जे चारभांगा ते विकलादेशी छे ते वस्तुना एकदेशने ग्रहे माटे तथा वली अस्तिपणाने विषे जे अस्तिपणो ते | नास्तिपणे नथी अने नास्तिपणो नास्तिपणे छे तेमां अस्तिपणो नथी. इहां कोइ पुछे के वस्तुमां जे नास्तिपणो ते अस्ति बालाव बोधसहित ॥ १११ ॥
SR No.600385
Book TitleJivvicharadi Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinduttasuri Gyanbhandar
PublisherJinduttasuri Gyanbhandar
Publication Year1928
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size22 MB
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