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________________ आगमसार प्रकरणम् तास शिष्य पाठक प्रवर, सुमतिसार गुणवंत । सकल शास्त्र ज्ञायक गुणी, साधुरंग जसवंत ॥ ७॥ तासशिष्य पाठक विबुध, जिनमत परमतजाण । भविककमल प्रतिबोधवा, राज सार गुरुभाण ॥८॥ ग्यानधर्म पाठक प्रवर, शमदम गुणे अगाह । राजहंस गुरु गुरु शक्ति, सहुजगकरे सराह ॥९॥ तासशिष्य आगमरुचि, जैनधर्मको दास । देवचंद आनंदमें, कीनो ग्रंथ प्रकाश ॥१०॥ आगमसारोद्धार एह, प्राकृत संस्कृत रूप । ग्रंथ कियो देवचंदमुनि, ग्यानामृत रस कूप ॥११॥ कस्यो इहां सहाय अति, दुर्गदास शुभचित्त । समजावन निज मित्रकुं, कीनो ग्रंथ पवित्त ॥ १२॥ धर्ममित्र जिन धर्म रतन, भविजन समकितवंत । शुद्ध अमरपद ओलखण, ग्रंथ कियो गुणवंत ॥ १३ ॥ तत्वग्यानमय ग्रंथ यह, जोवे वाला बोध । निजपर सत्ता सब लिखे, श्रोतालहे प्रबोध ॥ १४ ॥ ताकारण देवचंद मुनि, कीनो आगम ग्रंथ । भणसे गुणसे जे भविक, लहेशे ते शिवपंथ ॥१५॥ कथक शुद्ध श्रोतारुची, मिलजो एह संयोग । तत्वग्यान श्रद्धासहित, वली काय निरोग ॥ १६ ॥ परमागमसुं राचजो, लहेसो परमानंद । धर्मराग गुरु धर्मसे, धरजो ए सुखकंद ॥ १७॥ ग्रंथ कियो मनरंगसैं सितपख फागुणमास । भोमवार अरु तीज तिथि, सफल फली मन आस ॥१८॥ ॥ इति श्रीआगमसारोद्वार ग्रंथः समाप्तः ॥ ॥८४॥ ६
SR No.600385
Book TitleJivvicharadi Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinduttasuri Gyanbhandar
PublisherJinduttasuri Gyanbhandar
Publication Year1928
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size22 MB
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