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________________ स्वभाव ए इग्यार सामान्य स्वभाव सर्व द्रव्यमां छे ए सामान्य उपयोग दर्शन गुणथी देखे हवे दश विशेष स्वभाव कहे छे १ चेतन स्वभाव २ अचेतन स्वभाव ३ मूर्ति स्वभाव ४ अमूर्ति स्वभाव ५ एकप्रदेश स्वभाव ६ अनेकप्रदेश स्वभाव ७ शुद्ध स्वभाव ८ अशुद्ध स्वभाव ९ विभाव स्वभाव १० उपचरित स्वभाव ए दश विशेष स्वभाव ते कोइक द्रव्यमां कोइक स्वभाव छे कोइक द्रव्यमा कोइक स्वभाव नथी ए ज्ञानथी जाणे एटले सिद्ध भगवान लोकालोक सर्व ज्ञानोप. | योगथी जाणी रह्या छे दर्शनोपयोगथी देखी रह्या छे एहवा अनंत गुणी अरूपी सिद्ध भगवान छे ते समान पोतानी आत्माने जाणे उपादेय करी ध्यावे ते समकित जाणवो. ॥दोहा॥ अष्ट कर्म वन दाहके, भए सिद्ध जिनचन्द । ता सम जो अप्पागणे, वंदे ताको इंद ॥१॥ कर्मरोग ओषधसमी, ज्ञान सुधारस वृष्टि । शिवसुखामृत सरोवरी, जय २ सम्यक् दृष्टि ॥२॥ एहिज सद्गुरु शीख छे, एहिज शिवपुर माग । लेजों निज ज्ञानादिगुण, करजो परगुण त्याग ॥ ३॥ ग्यान वृक्ष सेवो भविक, चारित्र समकित मूल । अमर अगम पद फल लहो, जिनवर पदवी फूल ॥ ४ ॥ संवत सत्तर छिहत्तरे, मनशुद्ध फागुण मास । मोटे कोट मरोट मे, वसतां सुख चोमास ॥५॥ सुविहित खरतर गच्छ सुथिर, युगवर जिनचंदसूर । पुण्य प्रधान प्रधान गुण, पाठक गुणे पंडूर ॥ ६॥
SR No.600385
Book TitleJivvicharadi Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinduttasuri Gyanbhandar
PublisherJinduttasuri Gyanbhandar
Publication Year1928
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size22 MB
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