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________________ धर्मविधि होही ॥ ५७९ ॥ अह तं जंग्इ जणणी, यच्छे ? पाडेमि तुह इमं गभं । किं रक्खिएण इमिणा, तुह जीवियगहणपगुणेण ॥ प्रकरणम् ॥१२॥ ५८०॥ सा भणइ अंब ? गम्भो, परिवड्ढउ खेयमवि सहिस्से हैं । समगं पि बहुअवच्च-प्पसवे जं जीवइ वराही ॥५८१॥ सहि ऊण गम्भखेय, कुबेरसेणा दिणेसु पुण्णेसु । पुत्तं धूयपि तहा, पसवइ सा भाउभंडाई ॥ ५८२॥ माया पभणइ भद्दे ?, तुह रिउभूयं अवच्चजुयमेयं । उदरत्थेहि हिं, मरणदुवारं तुम नीया ॥ ५८३ ॥ तुह थन्नपियणनिरय, जुयल मिमं जुव्वणं हरिस्सइय । वेसाण जीविया पुण, तमेव ता रक्ख जत्तेण ॥ ५८४ ॥ उयराउ निग्गयमिम, जुयलं बाहिं पुरीसमिव चयसु । मा मोहल कुणसु सुए?, जे एस कुलक्कपो अम्ह ॥ ५८५ ॥ सा भणइ जइवि एवं, अंब ? विलंबसु तहा वि दसदिवसे । जाव अवच्चजुयमिमं, पोसेभि अहं अणाहं व ॥ ५८६ ॥ अह कहमवि जणणीए, एसा पुण सुंदरी अणुनाया । पोसेइ रत्तिदियह, ते बाले थन्नदाणेण ॥५८७ ॥ एवं च दारए ते, परिपालंतीइ तीइ अणुदियहं । कालरयणु ब्व दुसहो, पत्तो एगादसमदियहो॥ &ा ५८८॥ पुत्तो कुबेरदत्तो, कुबेरदना सुय ति नामजुए । कारितु मुद्दिए दो, निक्खिवइ तयंगुलीसु इमा ॥ ५८९ ॥ तत्तो कुबेरसेणा, दारुमयं कारिऊण मजूमं । रयणेहि पूरिऊण य, तत्थ इमे बालगे खिवइ ।। ५९० ॥ तत्तो तं मंजूसं, जमुणपवाहे ४ सय पचाहेइ । सा वि जलंमि तरंती, निरवायं जाइ हंसि व्व ॥ ५९१॥ तत्तो कुबेरसेणा, नियत्तिउं नियगिहमि संपत्ता। नयणंजलीहि सलिलं, अवच्चजुयलरस दितीच ॥ ५९२ ॥ मंजूसा वि हु सोरिय-पुरदारे दिणमुहे समणुपत्ता । इन्भतणएहि दोहि, दिट्ठा गहिया य सा तेहिं ॥ ५९३ । पिवखंति य तम्मझे, तं बालं बालियं च अह एगो । पुरी अवरो धूयं च, गहिय मुंचंति मंजूसं ॥ ५९४ ॥ नायाणि तेहि नामाणि, मुद्दियाअवखराण दंसणओ । पुत्तो कुबेरदत्तो, कुबेरदत्ता य धृय त्ति १२५॥
SR No.600381
Book TitleDharm vidhi Prakaranam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaysinhsuri, Shreeprabhsuri
PublisherHansvijayji Library
Publication Year1924
Total Pages320
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size24 MB
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