SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 20
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ धर्मविधि ॥४॥ मकरणम् हियए, घणागमेण कलाविव्व ॥ ५१ ॥ ठाणटिओ वि पणमइ, गुरुपाए अंतरंगभत्तीए । गच्छइ य न वंदेउँ, भएण पहुणो पएसिस्स ॥ ५२ ॥ चिंतइ य मज्झ सामी, जइ जाणिस्सइ समागए गुरुणो । ता एस मिच्छदिही, करिस्सई कि पि हु अवन्नं ॥ ५३॥ ती पढममेव एयं, गुरुपासे नेमि केण वि मिसेण | पडिबुद्ध एयमि य, चिटुंतु असंकिया गुरुणो ॥५४ ॥ अह तत्थ उवायं चिं-तिऊण सो आसवाहियामिसओ । गुरुउज्जाणतडिष्ट्रिय-बहियालि नेइ तं निवई ॥ ५५॥ अह वाहवाहियाए, तत्थ पएसी निवो परिस्संतो। नीओ तं उज्जाणं, विस्सामकए अमच्चेण ॥ ५६ ॥ सेयजलाविलगत्तो, तरुवरछायाइ वीसमंतो सो। अप्पाणममयसित्तं, व मन्नमाणो ठिओ जाव ।। ५७ ॥ ता निसुणइ सवणेहिं, निवो झुणिं तत्थ महुरगंभीरं । भणइ य मंतिं कि इत्थ, अत्थि य इत्थी समयकलिओ? ॥ ५८ ॥ मंती पभणइ सामिय, नाहं जाणेमि किंतु आरामे । पिक्खामो तो राया, गच्छइ से मज्झभागंमि ॥ ५९ ।। अह तत्थ य के एए, दंसणिणो किं कहंति एरिसया ? । इय कोउगेण पत्तो, मंताकिठुव्व नयरि31 जणो ॥ ६ ॥ तप्पुरओ केसिगुरू, गंभीरसरेण गुलगुलायंतो । उवएसदाणरसिओ, चिट्ठइ मयमत्तहत्थिव्व ॥६१ ॥ पुरओ | य संचलंतो, स भूवई पिक्खिऊण तं केसि । पभणेइ चित्तमंति, किं मुंडो आरडइ एसो ? ॥६२॥ कइया एसो इह आ-गओ य पासंडियाहमो चोरो । मा सचिव अम्ह देसं, मुसिस्सई अन्नदेसं व ॥ ६३ ।। लटूण अंगुलिमिमो, बाहुं पि गिलिस्सई खण| द्धण । ता निस्सारसु दुटुं, नियठाणाओ विसहरं व ॥६४॥ इय नरवइआणाए, मती गंतूण कइवयपयाई। चलिऊण भणइ सामिय, इत्थत्थे अस्थि विन्नत्ती ॥६५॥ निस्सारिओ वि एवं, एसो गंतूग अन्नदेसेसु । इय जणसभासु पयड, अक्खिस्सई विमुहभटुव्व ॥६६॥सेयवियानयरीसो,पएसिराया न याणई कि पि । जं नीसारइ सगुणे वि, जलहिवेलुव्व रयणाई ॥६७॥ता देव ! एस वायंमि, जंपिओ तुज्झ वयणसरविद्धो । सयमेव पलाइस्सइ, संगामे भग्गदप्पुव्व ॥६८॥देव ! तए सह वुत्तुं, न खमो वाईसरो |* AAMKAUGUSIC
SR No.600381
Book TitleDharm vidhi Prakaranam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaysinhsuri, Shreeprabhsuri
PublisherHansvijayji Library
Publication Year1924
Total Pages320
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy