SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 67
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पर्युषणा - ष्टान्हिका व्याख्यान ॥ ६३ ॥ पाळवाथी जे लाभ थाय छे, ते लाभ सर्व वेदोना पठन-पाठन करवाथी पण थतो नथी, तथा जीवदया पाळवाथी जे पुन्य उत्पन्न थाय छे, ते पुन्य सर्व प्रकारना यज्ञो करवाथी पण थतुं नथी, तथा जे लाभ जीवोना संरक्षण करवायी उत्पन्न थाय छे ते लाभ सर्व तीर्थोंना अभिषेको करवाथो पण थतो नथी. तथा मार्कडेयपुराणेऽपि - 66 यथा मम प्रियाः प्राणास्तथा तस्यापि देहिनः । इति मत्वा न कर्त्तव्यो, घोरः प्राणिवधो बुधैः ॥ १ ॥ " भावार्थ:- हे आत्मन् ! तहारे विचार करवो जोइए के जेवी रीते महारा प्राण मने वल्लभ छे, तेम बीजा जीवोने पण पोतना प्राण अत्यंत वल्लभ हशे अर्थात् छे, एवं नाणी पंडित पुरुषोए घोर (भयंकर) एवो प्राणीवध करवो नहि. पुनरप्युक्तम् — “ दीयते मार्यमाणस्य, कोटीं जीवितमेव वा । धनकोटीं परित्यज्य, जीवो जीवितुमिच्छति ॥२॥ "" SETOO CREEK भाषान्तरम् भावार्थ:- कोइ पण माणस कोइ जीवने मारवाने माटे तत्पर थएल होय ते समये तेमने कोटी द्रव्य तथा जीवितदान आ बनेमांथी तेमनी इच्छा अनुसार मागणी करवा दे तो मरणथी भय पामेल ते जीव, कोटी घननो ॥ ६३ ॥
SR No.600358
Book TitleParyushanasthahnika Vyakhyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManivijay
PublisherHirachand Hargovan Kapadia
Publication Year
Total Pages72
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy