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________________ सप्तविंशं खलुङ्गीयाख्यम श्रीउत्तराध्ययनसूत्रे श्रीनेमिच न्द्रीया सुखबोधाख्या लघुवृत्तिः । ध्ययनम्। कुशिष्यस्वरूपम् । ॥३१६॥ FoXXXXXXXXXXXX स्वयमेवाऽतिक्रामति, तद्विनीततादर्शनाद् आत्मनो विशेषतः समाधिसम्भवादिति भावः ॥ २॥ इत्थमात्मनः समाधिप्रतिसन्धानाय विनीतस्वरूपं परिभाव्य स एव अविनीतस्वरूपं यथा परिभावयति तथाऽऽहखलुंके जो उ जोएइ, विहम्माणो किलिस्सई । असमाहिं च वेएइ, तुत्तओ य से भजई ॥३॥ एग डसइ पुच्छम्मि, एगं विंधइऽभिक्खणं । एगो भंजइ समिलं, एगो उप्पहपट्टिओ ॥४॥ एगो पडइ पासेणं, निवेसइ निविजई । उकुद्दइ उप्फिडई, सढे बालगवी वए ॥५॥ माई मुद्धण पडई, कुद्धे गच्छइ पडिवहं । मयलक्खेण चिट्ठाई, वेगेण य पहावई ॥६॥ छिन्नाले छिंदई सिल्लिं, दुईते भंजई जुगं । से वि य सुस्सुयाइत्ता, उज्जुहित्ता पलायई ॥७॥ खलुंका जारिसा जुज्जा, दुस्सीसा विहु तारिसा। जोइया धम्मजाणम्मि, भजंति धिइदुबला ॥८॥ इड्डीगारविए एगे, एगित्थ रसगारवे । सायागारविए एगे, ऐगे सुचिरकोहणे ॥९॥ भिक्खालसिए एगे,एगे ओमाणभीरुए थद्धे । एगं च अणुसासम्मी, हेऊहिं कारणेहि य ॥१०॥ सो वि अंतरभासिल्लो, दोसमेव पकुव्बई। आयरियाणं तं वयणं, पडिकूलेइ अभिक्खणं ॥११॥ नसा मम वियाणाइ, नवि सामज्झ दाहिई। निग्गया होहि पन्ने, साहू अन्नोऽत्थ वच्चउ ॥१२॥ पेसिया पलिउंचंति, ते परियंति समंतओ। रायविट्टि व मनता, करेंति भिउडिं मुहे ॥१३॥ वाइयासंगहिया चेव, भत्तपाणेण पोसिया। जायपक्खा जहाहंसा, पक्कमति दिसोदिसि ॥१४॥ व्याख्या-'खलुकान्' गलिवृषभान यः 'तुः' विशेषणे योजयति वहने इति प्रक्रमः । स किम् ? इत्याह-"विहम्माणो" त्ति सूत्रत्वात् 'विध्यमानः' ताडयन् क्लिश्यति, अत एवाऽसमाधि वेदयते, 'तोत्रकश्च' प्राजनकः "से" इति XoxoxoxoXOXOXOXOXoxoxoxoxo ॥३१६॥
SR No.600356
Book TitleUttaradhyayanani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandracharya
PublisherPushpachandra Kshemchandra Balapurwala
Publication Year1937
Total Pages798
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_uttaradhyayan
File Size21 MB
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