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उत्तराध्ययन ॥३०८॥
द्वात्रिंशमध्ययनम्. (३२) गा६८-७३
काले अ अतित्तिलाभे ॥ ६७ ॥ रसे अतित्ते अ परिग्गहे अ, सत्तोवसत्तो न उवेइ तुहिँ ।
अतुट्ठिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आययई अदत्तं ॥ ६८॥ व्याख्या-इहादत्तं खण्डखाधफलादिकं रसवद्वस्तु ॥ ६८ ॥ मूलम्-तण्हाभिभूअस्स अदत्तहारिणो, रसे अतित्तस्स परिग्गहे अ। मायामुसं वइ लोभदोसा,
तत्थावि दुक्खा न विमुच्चई से ॥ ६९ ॥ मोसस्स पच्छा य पुरत्यओ अ, पओगकाले अ दुही दुरंते । एवं अदत्ताणि समाययंतो, रसे अतित्तो दुहिओ अणिस्सो ॥ ७० ॥ रसाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि । तत्थोवभोगेवि किलेसदुक्खं, निव्वत्तई जस्स कए ण दुक्खं ॥७१॥ एमेव रस्संमि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोहपरंपराओ। पदुद्दचित्तो अ चिणाइ कम्मं, जं से पुणो होइ दुहं विवागे ॥ ७२ ॥ रसे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोहपरंपरेण । न लिप्पई भवमझेवि संतो, जलेण वा पुक्खरिणीपलासं ॥७३॥४॥
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