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________________ उत्तराध्ययन ॥ २३६ ॥ १५ १८ २१ मूलम् — चक्खिदिअनिग्गहेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? चक्खिदियनिग्गहेणं मणाम रूवेसु रागद्दोसनिग्गहं जणयइ, तप्पच्चइअं नवं कम्मं न बंधइ, पुवबद्धं च निजरेइ ॥ ६३ ॥ ॥ ६५ ॥ घाणिदिएणं एवं चैव ॥ ६४ ॥ ६६ ॥ जिब्भिदिए वि ॥ ६५ ॥ ६७ ॥ फार्सिदिए वि ॥ ६६ ॥ ६८ ॥ नवरं गंधेसु रसेसु फासेसु वत्तत्वं ॥ व्याख्या - [ सूत्रचतुष्टयं प्राग्वत् व्याख्येयम् ] ॥ ६३ ॥ ६५ ॥ ६४ ॥ ६६ ॥ ६५ ॥ ६७ ॥ ६६ ॥ ६८ ॥ एतन्निग्रहोपि कषायविजयेनेति तमाह- मूलम् — कोहविजएणं भंते! जीवे किं जणयइ ? कोहविजएणं खंति जणयइ, कोहवेअणिजं कम्मं न बंधइ, पुवबद्धं च निज्जरेइ ॥ ६७ ॥ ६९ ॥ व्याख्या - क्रोधस्य विजयो दुरन्तत्वादिचिन्तनेन उदयनिरोधस्तेन 'कोहवेअणिज्वंति' क्रोधेन क्रोधाध्यवसायेन वेद्यते इति क्रोधवेदनीयं क्रोधहेतुभूतपुद्गलरूपं कर्म न बध्नाति "जं वेअइ तं बंधइ" इति वचनात् । पूर्वबद्धं च तदेव निर्जरयति ॥ ६७ ॥ ६९ ॥ एकोनत्रिंश मध्ययनम्. (२९) प्र ६३-६७ UTR-3
SR No.600340
Book TitleUttaradhyayanam Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraguptasuri
PublisherAnekant Prakashan Jain Religious Trust
Publication Year2010
Total Pages428
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_uttaradhyayan
File Size28 MB
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