SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 19
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री आगमीयसूक्तावली उत्तराध्यय नस्य सूक्तानि ॥१७॥ ६६ दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो, मोहो हओ जस्स न । इत्थीजणस्सारियझाणजुग्गं, हियं सया बंभवए रयाणं ॥ होइ तण्हा । तण्हा हया जस्स न होइ लोभो, लोभो |७३ कामं तु देवीहिं विभूसियाहिं, न चाइया खोभइउतिगुत्ता। हओ जस्स न किंचणाई ॥ (६२३)| तहावि एगंतहियंति नच्चा, विवित्तवासो मुणिणं पसत्थो॥ - ६७ रसा पगामं न हु सेषियव्वा, पायं रसा दित्तिकरा ७४ मुक्खाभिकंखिस्सवि माणवस्स, संसारभीरुस्स ठियस्स नराणं । दित्तं च कामा समभिद्दवंति, दुर्म जहा | धम्मे । नेयारिस्सं दुत्तरमत्थि लोए, जहत्थिओ बालसाउफलं व पक्खी ॥ . .. मणोहराओ॥ ६८ जहा दधग्गी परिंधगे वणे, समारुओ नोवसमं ७५ एए य संगा समइक्कमित्ता, सुहुत्तरा व हवंति सेसा । उबेद । एविंदियग्गीवि पगामभोइणो, न बंभयारिस्स | जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भवे अवि गंगासमाणा ॥ हियाय कस्सइ ॥ | ७६ कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं, सबस्स लोगस्स सदेव१९ विवित्तसिज्जाऽऽसणजंतियाणं, ओमासणाणं दमिइंदियाणं। गस्स । जं काइयं माणसियं च किच्चि, तस्संतयं न रागसत्तू धरिसेइ चित्तं, पराइओ बाहिरिवोसहेहिं॥ | गच्छद वीयरागो॥ ७० जहा बिरालावसहस्स मूले, न मूसगाणं वसहीपस- | ७७ जहा य किंपागफला मणोरमा, रसेण वन्नेण य भुजमाणा। स्था । एमेव इत्थीनिलयस्स मज्झे, न बंभयारिस्स ते खुद्दए जीविय पच्चमाणा, एओवमा कामगुणा विवागे (६२५) खमो निवासो॥ . | ७८ न कामभोगा समयं उविति, न यावि भोगा विगई उविति । ७१ न रूबलावण्णविलासहासं, न जंपिअं इंगिय पहियं वा। । जे तप्पओसी य परिग्गही य, सो तेसु मोहा विगई उवेद ॥(६३५) इत्थीण चित्तंसि निवेसइत्ता, द?, वयस्से समणे तवस्सी ॥ ७९ अच्चणं रयणं चेच, बंदणं पूअणं तहा । ७२ असणं चेव अपत्थणं च, अचितणं चैव अकित्तर्ण च । । इड्डीसकारसम्माणं, मणसावि न पत्थए ॥ (१६९) ॥१७॥
SR No.600311
Book TitleAgamiya Suktavalyadi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagaranandsuri, Anandsagarsuri
PublisherJain Pustak Pracharak Samstha
Publication Year1949
Total Pages76
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_related_other_literature
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy