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ज०वि० संयोग से । कौन नहीं हर्षात ॥ ५ ॥ उत्सवे लाया पुर विषे । मिल दम्पति सुखी ७३ ।। होय ॥ रहे सुख में जयजी इहां । हिवे धर्म कथा सुणो लोय ॥ ६॥ॐ ॥ ढाल |
। २० वी ॥ दलाली लालन की ॥ यह ॥ पुण्याइ जयजीकी । सुणो २ हो भवीका | चित लाय ॥ पुण्य ॥ टेर ॥ तिण अवसर पधारीयाजी । जयपुर बाग मझार ॥ | चरण करण गुण सागरुजी। मुनिवर बहु परिवार ॥ पु०॥ १॥ वनपालक सज | होय के जी। राज शभा में प्राय ॥ दी बधाइ मुनि श्रावीयाजी। सुणी सब अति हर्षाय ॥ पु०॥ २॥ सजी साजाइ राजवीजी । ले संग सेना सज्जन ॥ वंद्या श्रा मुनिवर भणीजी । तैसे ही बहु पुरजन ॥ पु०॥३॥ परिषद वैठी भरायके जी। | जग तारण मुनि राय । वागर्यो धर्म उपदेशने जी । अहो सुणो भव्य चित्त लाय ॥ पु० ॥ ४ ॥ अनित्य असार संसार में । मिल्यो मतलबी सब परिवार ॥ क्षीण भंगूर शरीर यह जी । मुरजाहो किमे ही विचार ॥ पु० ॥ ५॥ पुण्य संचातो मिली सायवीये । पुण्य खुटे विरलाय ॥ पुण्य छत्ते सुकरणी करे तो । अजरामर