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________________ ज०वि० लाल ॥ सुरत्व धरसिंह सारखा। चले दोनों कुमार हो लाल ॥ उ० ॥ १८ ॥N शकुन श्रेयकार तब भया। ऋद्धि सिद्धी दातार हो लाल ॥ समझा हर्षाया । घणा । सीख्या कला के मझार हो लाल ॥ उ० ॥ १६ ॥ निश्चयवादी क्षत्रि - कुली । उर सोच नहीं को लगार हो लाल ॥ विश्वास्या सुशकुन से ।। चलिया उत्सहा अपार हो लाल ॥ उ ॥ २० ॥ पुण्यात्म पगले पगले । पावे सुख । विशाल हो लाल । ऋषि अमोल ने यह कही । रसीली चौथी ढाल हो लाल ॥ । उ० ॥ २१ ॥ ॐ ॥ दुहा ॥ जामान्तर नरपति तदा । संभार्या कुमार । बोलाया 1 मिलिया नहीं । तब भय पायो अपार ॥१॥ रखे किहां ही गुप्त रही। करे अचिन्ती घात । ढूंढावे अति खंत से । द्वारपाल तब भात ॥२॥ द्वार पत्र जे लगावियो । कहा सहु समाचार । नृप सामंत साथे लही । तत्क्षिण आया द्वार ॥३॥ पढ़िया श्लोक तिहूं प्रकट तहां । अर्थ समझा सब भूप । परसंस्ये खुल्ले N मुखे । हाहा बुद्धि अनूप ॥ ४ ॥ चिन्ते नृपति श्रेय भयो । सहजे टलियो पाप ।
SR No.600301
Book TitleSamyktotsav Jaysenam Vijaysen
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRupchandji Chagniramji Sancheti
Publication Year
Total Pages190
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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