SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 121
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ज०वि० ११२ ॥ मझार ॥ देव देवी पणे ऊपना । जाणी ज्ञान मझार ॥ ३॥ तत्क्षीणे आइ पुत्र पे। देखाइ निज रिद्ध ॥ सम्यक्त्व धर्म पसाये मे । डून्या तिरे यह विध ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष फल देखी धर्म का । धर्मी हुवा घणा लोक । सुरसुरी स्वर्गे गया । भोगवे पुण्य का थोक ॥ ५ ॥ 8 ॥ ढाल ४ चौथी ॥ मानव जन्म २ रत्न तेने पायोरे ॥ यह० ॥ समकित रत्न २ सदा सुखदाइजी । धारो भव्य हुलसाइ ॥ स० ॥ टेर ॥ । भमर भानु धर्म पाप फल देख्या । प्रत्यक्ष परिचय लेख्याजी ॥ अति चित्त हर्षाया। धन्य २ मुनिराया । सुख पन्थे लगाया ॥ सम ॥ १॥ अति दुर्लभ येह अवसर पायो । लेवां लावो चित्त चायोजी ॥ यों धरी उत्साहो । शुद्ध सम्यक्त्व गाहो । | ले व्रतादि लाहो ॥ स०॥ २॥ दान देवे पर्वे शील पाले । तप करे धर्म उजमालेजी। पण कर्म गति भारी । वक्ते फिरे अाडी पारी । देवे बुद्धि बिगाड़ी ॥ स०॥३॥ मन मांहें धर्म जाणे साची । प्रमाद बध्यो पड्या काचाजी । भोग || सुखे ललचाइ । रह्या मोह मुरझाइ । करणी करी ढीलाइ ॥ स०॥ ४ ॥ मुनि
SR No.600301
Book TitleSamyktotsav Jaysenam Vijaysen
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRupchandji Chagniramji Sancheti
Publication Year
Total Pages190
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy