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________________ प्रतिक्रमणा ध्ययने ॥१२४॥ भिक्षुप्रतिमा 1555453 दुरायं वा वत्थए, णो से कप्पति एगरायाओ वा दुरायाओ वा परं वत्थए, जइ तत्थ एगरायातो वा परं वसति से संतरा छेदे वा परिहारे वा, तस्स णं कप्पंति चत्तारि भासाओ भासित्तए, तंजथा- जातणी पुच्छणी पण्णवणी सुद्धस्स वागरणी, तस्स णं कप्पंति तओ उवस्सगा अणुण्णवेत्तए, तंजथा- अधे आगमणगिहंसि वा अहे वियडगिहंसि वा रुक्खमूलगिहसि वा, तस्स णं कप्पति | तओ उवस्सगा ओवाणियत्तए, तं चेव, तस्स णं कप्पति तओ संथारगा पडिलेहित्तए, तं०- पुढविसिल वा कट्ठसिलं वा अथासं-18 &थडमेव, तस्स णं कप्पति से पुब्धि पडिलेहित्तए, तओ संथारगा अणुण्णवेत्तए तं चेव, तस्स णं कप्पति तओ संथारगा उवायाण तए, तं चेव, मासियं० इत्थी उवस्सयं उवागच्छिज्जा सइत्थीए वा पुरिसे णो से कप्पति तं पडुच्च निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा, से उच्चारपासवणेणं ओबाहिज्जमाणे कप्पति उग्गेण्हितए वा पगिण्हत्तए वा, कप्पति से पुवपडिलेहिते थंडिल्ले उच्चारपासवणं | परिद्ववेत्तए, तमेव उवस्सयं आगम आहाविहमेव ठाण, ठाइत्तए, मासियं केइ उवस्सय अगणिकाएणं झामेज्जा नो से कप्पति तं | पडुच्च निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा, तत्थ णं केइ बाहाए गहाय आगसेज्जा णो से कप्पति अवलंबित्तए वा पच्चवलंबित्तए वा, कप्पइ से आहारियं रिइत्तए, मासियं० पायंसि खाणु वा कंटए वा हीरे वा सक्करा वा अणुपविसेज्जा णो से कप्पति निहरित्तए वा विसोहित्तए वा, कप्पति से आधारियं रीइत्तए, मासियं० अच्छिसि पाणाणि वा बीयाणि वा रए वा परियावज्जेज्ज नो से | कप्पति नीहरित्तए वा विसोहित्तए वा कप्पति से आहारीयं रियित्तए, मासिय० जत्थ सूरिए अत्थमज्जा तं०-जलांस वा थलांस वा दुग्गंसि वा निन्नसि वा पव्वयंसि वा विसमंसि वा तत्थेव सा रयणी उवादिणावेत्ता सिया, नो से कप्पति पदमवि गमित्तए, कप्पति से कल्लं पादुप्पभाते जाव जलंते पाइणाभिमुहस्स वा पदीणाभिमुहस्स वा दाहिणाभिमुहस्स वा उत्तराभिमुहस्स वा ॥१२४॥
SR No.600291
Book TitleAavashyak Sutram Uttar Bhag
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami, Jindasgani Mahattar
Author
PublisherRushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha
Publication Year1929
Total Pages328
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size7 MB
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