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उपासकदशांग सानुवाद
॥४०॥
कामभोगासंसप्पओगे १३।
१ आनंदाप्रयोग-'हुँ घणा काळ सुधी जीवं तो सारुं एवी इच्छा करवी. ४ मरणाशंसाप्रयोग हुं शीघ्र मरण पामुं तो ठीक' ए प्रमाणे
10 ध्ययन मरणनी इच्छा करवी. ५ कामभोगाशंसाप्रयोग-कामभोगनी इच्छा करवी. उदयमा देशविरतिनो नाश थाय छे, पण सम्यक्त्व सातिचार के निरतिचार बन्ने प्रकारर्नु होय छे. प्रथम अनन्तानुबन्धीना उदयमा
॥४०॥ सम्यक्त्वनो नाश थाय छे. ए प्रमाणे ज छे, जो एम न होय तो देशतः भंगरूप सम्यक्त्वना अतिचारो होय त्यारे प्रायश्चितरूपे तपज | कहेलुं छे अने सर्व भंगरूप होय तो मूळ प्रायश्चित कहेलुं छे ते केम घटे ? (प्र०)-अनन्तानुबन्धी वगेरे बार कषायो सर्वघाती छे अने संज्वलन कषाय देशघाती छे, तेथी सर्वघातीना उदये मूळथी छेद थाय अने देशघाती संज्वलनना उदयमां अतिचारो होय छे, माटे वार कषायना उदयमां सर्वथा भंग थवो जोइप ? (उ०)-सत्य छे, परन्तु जे बार कषायोर्नु सर्वघातीपणुं छे ते सर्वविरतिनी अपेक्षाए ज शतकचूर्णिकारे का छे, परन्तु सम्यक्त्वादिनी अपेक्षाए नथी. ते प्रमाणे तेमनुं वाक्य छ-'भगवप्पणीयं पंचमहन्वय| मइयं अवारससीलंगसहस्सकलियं चारित्तं घाएन्ति त्ति सव्वघाइणो"त्ति-भगवंते कहेल पांच महाव्रतमय अने अढार हजार शीलांग वडे युक्त चारित्रनो घात करे छे माटे सर्वघाती कहेवाय छे. वळी 'जारिसओ' इत्यादि गाथाना सामर्थ्यथी अतिचार अने भंग देशविरति अने सम्यक्त्वना जाणवा.
'अपच्छिम' इत्यादि. जेनाथी पश्चिम-पछी बीजुं नथी ते अपश्चिम-सौथी छेल्ली, मरण-प्राणनो त्याग करवो, ते रूप अन्त ते मरणान्त, ते समये थयेली ते मारणान्तिकी, संलिख्यते अनया-जे वडे शरीर अने कषायादि कुश कराय ते संलेखना-तपविशेष, तेनी
१ श्रावक आवश्यक योग-संयम व्यापार- पालन करवाने अशक्त होय त्यारे अथवा मृत्युसमय प्राप्त थयो होय त्यारे संलेखना करे छे. जे बड़े शरीर अने कषायादि कृश कराय ते संलेखना. तेमां शरीरसंलेखना-अनुकमे भोजननो त्याग करवो अने कषायसंलेखना-क्रोधादि कषायनो त्याग करवो, तेमां शरीरसंलेखना